जम्मू , अप्रैल 15 -- एक अध्ययन में यह तथ्य सामने आया है कि जम्मू कश्मीर के सीमावर्ती गांवों के ग्रामीण अपने ही देश में रहने के बावजूद अधिकारों के अभाव के कारण खुद को शरणार्थी एवं विस्थापित महसूस करते हैं और इन सीमावर्ती समुदायों के लिए भूमि अधिकार, सुरक्षा तथा आजीविका के साधनों का समाधान ही उनके समावेशी विकास का एकमात्र मार्ग है।
जम्मू विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग की पूर्व प्रमुख प्रोफेसर आभा चौहान भारत-पाक सीमा के पास खौर और अखनूर सेक्टरों के अपने दस दिवसीय दौरे के बाद सीमावर्ती निवासियों के कठिन जीवन और उनके अधिकारों के संघर्ष को देखने के बाद इस नतीजे पर पहुंची हैं।
पल्लनवाला और खौर जैसे अग्रिम गांवों का व्यापक दौरा करने के बाद प्रोफेसर चौहान ने कहा कि सीमा पर रहना बेहद चुनौतीपूर्ण है, जहां लोग हर दिन डर और मानसिक तनाव के साये में बिताते हैं। उन्होंने निवासियों के साथ सीधे बातचीत करके उनकी सामाजिक-आर्थिक और सुरक्षा संबंधी समस्याओं को करीब से समझने का प्रयास किया।
इस समाजशास्त्री से बातचीत में निवासियों ने सबसे प्रमुख मुद्दा 1947-48 और 1971 के युद्धों के बाद आवंटित की गई भूमि पर मालिकाना हक का उठाया। कई परिवार दशकों से इन जमीनों पर खेती कर रहे हैं, लेकिन कानूनी दस्तावेजों के अभाव में वे सरकारी योजनाओं, ऋण और कृषि निवेश के लाभों से वंचित हैं। इसके अलावा, सीमा पार तनाव और आवाजाही पर पाबंदियों के कारण उनकी आजीविका अक्सर बाधित होती है। ग्रामीणों ने बताया कि पूर्व में सेना के शिविरों, खनन और सीमा पर बाड़ लगाने के लिए ली गई जमीनों का मुआवजा या तो आंशिक मिला या अब पूरी तरह बंद कर दिया गया है। अचानक हालात बिगड़ने पर किसान समय पर खेतों तक नहीं पहुंच पाते, जिससे फसलों का भारी नुकसान होता है और उन पर आर्थिक बोझ बढ़ जाता है।
सुरक्षा के मोर्चे पर बंकरों की स्थिति और उनकी उपलब्धता को लेकर भी गंभीर चिंताएं जताई गईं। स्थानीय लोगों के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में बने बंकर या तो पर्याप्त नहीं हैं या उनकी देखरेख ठीक से नहीं होती, और कई बंकर रिहायशी इलाकों से काफी दूर हैं। गोलाबारी की स्थिति में सुरक्षित स्थानों तक त्वरित पहुंच सुनिश्चित करने के लिए ग्रामीणों ने और अधिक मजबूत और सुलभ बंकरों की आवश्यकता पर जोर दिया। इसके साथ ही, इन दूरदराज के क्षेत्रों में सड़कों, स्वास्थ्य सुविधाओं, स्कूलों और संचार नेटवर्क जैसे बुनियादी ढांचे के अभाव पर भी विस्तार से चर्चा की गई।
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