श्रीनगर , अक्टूबर 22 -- जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख उच्च न्यायालय ने जन सुरक्षा अधिनियम (पीएसए) के तहत 'यांत्रिक' (बिना सोचे-समझे) और लापरवाही से पारित किए गए निवारक हिरासत आदेश पर कड़ी नाराजगी जताई है। न्यायमूर्ति वसीम सादिक नर्गल की पीठ ने श्रीनगर के उपायुक्त को व्यक्तिगत रूप से अदालत में पेश होने का निर्देश दिया है पिछले सप्ताह बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति नरगल ने कहा कि श्रीनगर के जुबैर अमीन बांगरू के खिलाफ हिरासत के आधारों में ठोस जानकारी नहीं मिली है। अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि क्या हिरासत का आदेश देने वाले अधिकारी ने पुलिस द्वारा दी गई सामग्री का स्वतंत्र रूप से आकलन किया था या नहीं।
अदालत ने उपायुक्त को निर्देश दिया है कि वह पुलिस डोजियर, हिरासत का आदेश देने वाले अधिकारी के समक्ष रखी गई सामग्री और उस रिकॉर्ड के साथ व्यक्तिगत रूप से पेश हों, जिससे यह पता चले कि हिरासत का आदेश देते समय किस आधार पर विचार किया गया और अधिकारी किस तरह संतुष्ट हुआ।
अदालत ने कड़े शब्दों में अधिकारी से पूछा है कि "उन्होंने बिना उचित विचार-विमर्श के, इतनी लापरवाही और यांत्रिक तरीके से यह हिरासत आदेश क्यों जारी किया?"न्यायालय ने एक मुख्य चिंता यह भी जताई कि हिरासत के आधारों के दूसरे पैराग्राफ में "उल्लिखित आतंकवादी" शब्द का इस्तेमाल किया गया है, जबकि इससे पहले किसी भी आतंकवादी की पहचान या जिक्र नहीं किया गया था।
न्यायालय ने पाया कि पहले पैराग्राफ में केवल यह औपचारिक बात कही गई है कि हिरासत का आदेश देने वाले अधिकारी ने मामले पर विचार किया है लेकिन इसमें किसी भी आतंकवादी की पहचान नहीं बताई गई है।
इस विसंगति की ओर ध्यान दिलाते हुए न्यायमूर्ति नरगल ने टिप्पणी की कि शब्दों की बनावट से "साफ पता चलता है कि हिरासत के आधार तैयार करते समय, पुलिस डोजियर (दस्तावेजों) में दी गई जानकारी पर बिना किसी उचित विचार-विमर्श के, उसे ज्यों का त्यों उठा लिया गया है।" अदालत ने कहा कि यह बात "इस संदेह को पुख्ता करती है कि क्या हिरासत का आदेश देने वाले अधिकारी ने स्वतंत्र रूप से मामले की जांच करके हिरासत के आधार तय किए या फिर उसने बस पुलिस डोजियर में लिखी बातों को ही दोहरा दिया।"हिरासत के आधारों में बंगरू पर आरोप लगाया गया था कि उसके आतंकवादियों के साथ करीबी संबंध थे, वह आतंकवादियों को लॉजिस्टिक और नैतिक समर्थन देता था, उसने अपने घर और अन्य जगहों को आतंकवादियों के छिपने के ठिकाने के रूप में इस्तेमाल करने दिया, और वह एक आतंकवादी नेटवर्क के साथियों के संपर्क में था। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने निदा नजीर ने हालांकि दलील दी कि ये आरोप अस्पष्ट हैं और इनमें जरूरी विवरणों की कमी है। इनमें आतंकवादियों की पहचान, नेटवर्क के साथियों के नाम, छिपने के ठिकानों के रूप में इस्तेमाल की गई जगहों का ब्योरा, और उन विशिष्ट घटनाओं का जिक्र नहीं है जिनमें कथित तौर पर समर्थन दिया गया था।
अधिवक्ता ने इस बात पर भी सवाल उठाया कि उन व्यक्तियों की पहचान के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई है, जिन्हें कथित तौर पर बंगरू ने गैर-कानूनी गतिविधियों में शामिल होने के लिए प्रेरित या उकसाया था। साथ ही इस बात का भी कोई स्पष्ट विवरण नहीं है कि इन कथित कार्यों से राज्य की सुरक्षा पर क्या प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।
अदालत ने अपनी शुरुआती जांच में इस तर्क में "काफी दम" पाया कि इन आधारों में उस स्पष्टता और बारीकी का अभाव है, जिसकी अपेक्षा किसी व्यक्ति की निजी स्वतंत्रता छीनने वाले आदेश में की जाती है।
अदालत ने टिप्पणी की, "केवल आरोप की गंभीरता ही, प्रासंगिक सामग्री और स्वतंत्र रूप से सोच-विचार करने की आवश्यकता की जगह नहीं ले सकती।" अदालत ने निवारक हिरासत आदेशों को लेकर एक व्यापक चिंता भी जताई।
अदालत ने इस मामले से ठीक पहले सूचीबद्ध एक और बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका का भी जिक्र किया। उस मामले में भी एक ऐसा हिरासत आदेश सामने आया था, जो पहली नजर में ऐसा लग रहा था जैसे हिरासत देने वाले अधिकारी ने खुद कोई स्वतंत्र मूल्यांकन करने के बजाय, केवल पुलिस की रिपोर्ट (डोजियर) को ही ज्यों का त्यों उतार दिया हो।
अदालत ने कहा कि इस समानता ने "एक परेशान करने वाला सवाल" खड़ा कर दिया है: क्या निवारक हिरासत की शक्तियों का इस्तेमाल सामग्री के स्वतंत्र और निष्पक्ष मूल्यांकन के जरिए किया जा रहा है, या फिर केवल पुलिस के दावों को बिना सोचे-समझे दोहराकर?अदालत ने हालांकि माना कि पुलिस की रिपोर्ट (डोजियर) पर विचार किया जा सकता है लेकिन साथ ही यह भी जोर दिया कि यह हिरासत देने वाले अधिकारी की उस जिम्मेदारी की जगह नहीं ले सकती, जिसके तहत उसे सामग्री की स्वतंत्र रूप से जांच करनी होती है, उसकी प्रासंगिकता का आकलन करना होता है और कानून के अनुसार खुद संतुष्ट होना होता है।
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