श्रीनगर , जुलाई 02 -- जम्मू कश्मीर छात्र संघ (जेकेएसए) ने गुरुवार को भारत और पाकिस्तान के बीच रचनात्मक संवाद की बहाली का समर्थन किया और कहा कि दक्षिण एशिया में स्थायी शांति, क्षेत्रीय स्थिरता एवं साझा समृद्धि केवल निरंतर कूटनीतिक सहभागिता, पारस्परिक सम्मान तथा शांतिपूर्ण संवाद के माध्यम से ही प्राप्त की जा सकती है।

भारत की सुरक्षा संबंधी वास्तविक चिंताओं को स्वीकार करते हुए और आतंकवाद के सभी रूपों की स्पष्ट निंदा करते हुए जेकेएसए ने कहा कि तनाव कम करने, टकराव रोकने एवं स्थायी शांति के लिए अनुकूल माहौल तैयार करने के लिए सार्थक बातचीत एक अनिवार्य साधन है।

जेकेएसए ने कहा कि दक्षिण एशियाई देशों के बीच बेहतर क्षेत्रीय सहयोग से व्यापार, शिक्षा, नवाचार, पर्यटन एवं आर्थिक विकास को बढ़ावा मिल सकता है। संघर्ष के कारण पीड़ित हुए सैनिकों, सुरक्षा कर्मियों और नागरिकों को सबसे बड़ी श्रद्धांजलि यह होगी कि जिम्मेदार कूटनीति के माध्यम से भविष्य में जीवन की हानि को रोका जाए जबकि आतंकवाद के प्रति पूरी तरह से अडिग रहा जाये।जम्मू-कश्मीर के युवाओं के लिए, शांति केवल एक चाहत नहीं बल्कि एक आवश्यकता है।

जेकेएसए के राष्ट्रीय संयोजक नासिर खुहामी ने एक बयान में कहा कि जम्मू कश्मीर के लोगों ने दशकों से चले आ रहे संघर्ष के मानवीय, सामाजिक एवं आर्थिक परिणामों को झेला है। उन्होंने कहा, "जब कभी भारत और पाकिस्तान के संबंध बिगड़े हैं तब सबसे ज्यादा कीमत छात्रों, परिवारों, व्यापारियों, सीमावर्ती क्षेत्रों के निवासियों एवं आम नागरिकों को ही चुकानी पड़ी है। तनाव बढ़ने की स्थिति में शिक्षा, आजीविका, पर्यटन, व्यापार एवं विकास बाधित होती है इसलिए यह अत्यंत आवश्यक है कि शांति को बढ़ावा देने, शत्रुता को कम करने और ऐसा वातावरण बनाने के लिए ईमानदार प्रयास किया जाये जहां विकास, शिक्षा एवं मानव कल्याण फल-फूल सकें।"संघ ने नागरिक समाज एवं सार्वजनिक जीवन की ओर से बढ़ती हुई उन मांगों का स्वागत किया जो भारत-पाकिस्तान सहभागिता को पुनर्जीवित करने के पक्ष में हैं, जिसमें आरएसएस नेताओं की हालिया टिप्पणियां भी शामिल हैं जो निरंतर संवाद और जन-से-जन संपर्क का समर्थन कर रहे हैं। इसने दोनों देशों के 100 से अधिक प्रमुख नागरिकों की उस अपील का भी स्वागत किया जिसमें दोनों सरकारों से द्विपक्षीय वार्ता बहाल करने, विश्वास-निर्माण उपायों को मजबूत करने एवं संचार को सामान्य बनाने का आग्रह किया गया है।

श्री खुहामी ने कहा कि संवाद को कभी भी कमजोरी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए बल्कि इसे राजनीतिक परिपक्वता एवं जिम्मेदार राज कौशल के रूप में देखा जाना चाहिए। उन्होंने वैश्विक उदाहरणों का हवाला दिया जहां पूर्व विरोधियों ने बातचीत के जरिए संघर्षों का समाधान किया। उन्होंने जोर दिया कि स्थायी शांति युद्धभूमि के बजाय निरंतर जुड़ाव, धैर्य एवं पारस्परिक सम्मान से प्राप्त होती है।

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