दरभंगा , मई 02 -- मैथिली भाषा एवं मिथिला के विकास के लिए मिथिला राज्य की मांग के लिये सक्रिय विद्यापति सेवा संस्थान ने जनगणना के मातृभाषा कॉलम में संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल मैथिली भाषा का विकल्प नहीं दिए जाने पर आक्रोश जताया है।

महासचिव डॉ. बैद्यनाथ चौधरी बैजू ने शनिवार को संस्थान की कार्यालय में आयोजित बैठक में प्रस्ताव रखते हुए कहा कि संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करीब दस करोड़ से अधिक लोगों की मातृभाषा मैथिली के नाम पर अपनाई जा रही तुष्टिकरण की राजनीति बर्दास्त नहीं की जाएगी। उन्होंने कहा कि मैथिली के नाम पर मिथिला क्षेत्र को अंग-भंग करने की सरकार की मंशा उजागर हो चुकी है। इसे कतई बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष बुचरू पासवान ने कहा कि सरकार की ओर से करोड़ों लोगों की मातृभाषा मैथिली को जनणना में दर्ज करने से वंचित करना असंवैधानिक है। आज मिथिला के जन-जन में अपनी मातृभाषा के प्रति अब न सिर्फ चेतना जाग चुकी है, बल्कि विरोध के स्वर भी मजबूती के साथ मुखर हो रहे हैं।

बिहार राज्य मैथिली अकादमी के पूर्व अध्यक्ष पं. कमलाकांत झा ने कहा कि संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल मैथिली भाषा न सिर्फ भाषाई रूप से काफी समृद्ध है बल्कि, इसका वैज्ञानिक आधार होने के साथ ही इसकी स्वतंत्र लिपि मिथिलाक्षर आज संरक्षित, संवर्धित, व्यवहृत और कंप्यूटर फॉन्ट की सुविधा से संपन्न है। बावजूद इसके तुष्टिकरण की राजनीति के तहत इसे आघात पहुँचाया जाना समझ से परे है।

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