नयी दिल्ली , अगस्त 10 -- उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को शिवसेना (यूबीटी) की उस याचिका पर सुनवाई दो सप्ताह के लिए टाल दी, जिसमें लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के उस फैसले को चुनौती दी गयी थी, जिसके तहत पार्टी के छह बागी सांसदों के महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में विलय को मान्यता दी गयी थी।
न्यायमूर्ति पमिदिघंटम श्री नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने गौर किया कि लोकसभा अध्यक्ष और लोकसभा सचिवालय के संयुक्त सचिव (जिन्होंने विलय को मान्यता देने वाला 18 जुलाई का सर्कुलर जारी किया था) की ओर से कोई वकील पेश नहीं हुआ।
याचिकाकर्ता और लोकसभा में शिवसेना (यूबीटी ) के नेता अरविंद गणपत सावंत की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने न्यायालय को बताया कि लोकसभा अध्यक्ष के कार्यालय और संयुक्त सचिव, दोनों को नोटिस भेजा जा चुका है। उन्होंने मामले की गंभीरता का हवाला देते हुए अंतरिम राहत की मांग की।
पीठ ने हालांकि कहा कि अंतरिम राहत की मांग पर विचार करने से पहले वह प्रतिवादियों को पेश होने का समय देगी।
श्री सिब्बल ने दलील दी कि जब छह सांसदों के खिलाफ अयोग्यता की कोई याचिका लंबित नहीं थी, तो लोकसभा अध्यक्ष के पास विलय को मान्यता देने वाला आदेश पारित करने का कोई अधिकार नहीं था। उन्होंने आगे कहा कि विलय को मान्यता देने से पहले अध्यक्ष ने शिवसेना (यूबीटी) को अपनी बात रखने का मौका नहीं दिया था।
याचिका में लोकसभा सचिवालय के संयुक्त सचिव की ओर से जारी परिपत्र को असंवैधानिक, गैर-कानूनी और गलत बताते हुए कहा गया है कि अपनी मूल राजनीतिक पार्टी के खिलाफ जाकर विधायकों के एकतरफा दावों के आधार पर विलय को न तो कोई संवैधानिक या कानूनी मान्यता है और न ही यह संसदीय लोकतंत्र के अनुरूप है। याचिका में इस परिपत्र को 'संवैधानिक आत्महत्या'भी बताया गया है, जो संसदीय लोकतंत्र की नींव को कमजोर करता है। याचिका में इस बात पर जोर देते हुए शीर्ष न्यायालय से आग्रह किया गया है कि संसदीय लोकतंत्र संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा है और वह 'सतर्क प्रहरी'की भूमिका निभाते हुए इस परिपत्र को रद्द करे तथा उन छह सांसदों को विपक्षी राजनीतिक दलों के साथ मिलकर सदन में काम करने और लोकतांत्रिक ढांचे को कमजोर करने से रोके।
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