वाराणसी , अक्टूबर 30 -- काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के समाजशास्त्र विभाग की ओर से आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 'जेंडर इन फ्लक्स' का उद्घाटन शुक्रवार को वैदिक विज्ञान केंद्र में हुआ। इसमें भारत सहित छह देशों के विद्वानों ने जेंडर, सामाजिक परिवर्तन, समानता और भारतीय ज्ञान परंपरा के विभिन्न पहलुओं पर विचार-विमर्श किया।
मुख्य वक्ता पद्मश्री निवेदिता रघुनाथ भिड़े ने कहा कि जेंडर संबंधी प्रश्नों को भारतीय समाज के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और दार्शनिक संदर्भों में समझने की जरूरत है। महिलाओं की आकांक्षाओं और अवसरों को जैविक पहचान के आधार पर सीमित नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने परिवार में घरेलू जिम्मेदारियों को महिला और पुरुष के बीच साझा करने पर जोर दिया।
मुख्य अतिथि पद्मभूषण प्रो. कपिल कपूर ने विकास को केवल भौतिक उपलब्धियों तक सीमित न रखते हुए मानवीय चेतना, सामाजिक उत्तरदायित्व और सामूहिक कल्याण से जोड़कर देखने की बात कही।
अध्यक्षीय संबोधन में कुलपति प्रो. अजीत कुमार चतुर्वेदी ने कहा कि भारतीय समाज में पिछले पांच-छह दशकों में जेंडर भूमिकाओं, पहचान और अवसरों में उल्लेखनीय बदलाव आया है। हालांकि समानता की दिशा में अभी काफी काम किया जाना बाकी है। उन्होंने शोधकर्ताओं से भारतीय सामाजिक अनुभवों पर आधारित मौलिक शोध और पाठ्यसामग्री विकसित करने का आह्वान किया।
विभागाध्यक्ष प्रो. श्वेता प्रसाद ने कहा कि संगोष्ठी का उद्देश्य भारतीय सामाजिक यथार्थ, सांस्कृतिक परंपराओं और स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों के आधार पर जेंडर अध्ययन की प्रचलित अवधारणाओं का आलोचनात्मक परीक्षण करना है। उद्घाटन के बाद आयोजित दो विचार-सत्रों में जेंडर विमर्श के उपनिवेशवाद-मुक्त दृष्टिकोण, नारीवादी शोध, बालिका शिक्षा, सामाजिक समावेशन, दलित महिलाओं के अनुभवों और सामुदायिक लचीलेपन जैसे विषयों पर चर्चा हुई। वक्ताओं ने समावेशी और न्यायपूर्ण समाज के निर्माण के लिए भारतीय संदर्भों पर आधारित अकादमिक अध्ययन को महत्वपूर्ण बताया। कार्यक्रम में देश-विदेश के अनेक सामाजिक वैज्ञानिक, विश्वविद्यालय के शिक्षक और शोधार्थी उपस्थित रहे।
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