नैनीताल , सितंबर 03 -- उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने वर्ष 1999 के जानलेवा हमले के मामले में बुधवार को अहम निर्णय जारी करते हुए तीन आरोपियों को बरी करने के निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए अपील खारिज कर दी।
न्यायमूर्ति रविंद्र मैठाणी और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ साह की खंडपीठ ने माना कि अभियोजन आरोपियों के खिलाफ मामला संदेह से परे साबित नहीं कर सका। इस मामले में खंडपीठ ने विगत 18 अगस्त को सुनवाई के बाद निर्णय सुरक्षित रख लिया था और आदेश की प्रति गुरुवार को जारी की।
यह मामला चार जुलाई 1999 को हरिद्वार के ज्वालापुर थाना क्षेत्र के रानीपुर झाल का है। अपीलकर्ता वेद प्रकाश शर्मा उर्फ पहलवान के अनुसार वह खेत में ट्रैक्टर से जुताई कर रहा था, तभी सोहन सिंह, कुलदीप सिंह उर्फ लखमीर सिंह और परमजीत सिंह वहां पहुंचे और फायरिंग की। आरोप था कि एक गोली अपीलकर्ता के हाथ में लगी, जिसके बाद उसने लाइसेंसी पिस्टल से जवाबी फायर किया, जिससे कुलदीप सिंह घायल हुआ। मामले में 10:40 बजे धारा 307 भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के तहत प्राथमिकी दर्ज हुई।
जांच के बाद पुलिस ने फाइनल रिपोर्ट दाखिल कर दी। पुनर्विवेचना के बावजूद मामला अदालत पहुंचा और 23 जनवरी 2008 को आरोपियों के खिलाफ धारा 307/34 आईपीसी के तहत आरोप तय हुए। वर्ष 2013 में हरिद्वार की पांचवीं अपर सत्र अदालत ने तीनों को बरी कर दिया था, जिसके खिलाफ वेद प्रकाश शर्मा ने हाईकोर्ट में अपील की।
हाईकोर्ट ने पाया कि अभियोजन के गवाहों के बयान महत्वपूर्ण बिंदुओं पर एक-दूसरे से मेल नहीं खाते। केपी सिंह शर्मा और जिया लाल ने घटना को प्रत्यक्ष देखने की पुष्टि नहीं की और कहा कि उन्होंने अपने खेत से गोली चलने की आवाज सुनी थी। उन्होंने अपीलकर्ता को पुलिस थाने या अस्पताल ले जाने की बात से भी इनकार किया।
अदालत ने मेडिकल और प्राथमिकी में देरी को भी महत्वपूर्ण माना। घटना सुबह करीब 7:45 बजे की बताई गई, जबकि मेडिकल 10:30 बजे और प्राथमिकी 10:40 बजे हुई। मेडिकल रिपोर्ट में हाथ में गोली के प्रवेश और निकास के घाव दर्ज थे, लेकिन एक्स-रे में कोई असामान्यता नहीं मिली। चोट किस तरह लगी, इसे लेकर भी अदालत ने संदेह व्यक्त किया।
हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित