मुंगेली/बेमेतरा , अक्टूबर 20 -- देशभर में विजयादशमी का पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। इस अवसर पर विभिन्न स्थानों पर रावण दहन की परंपरा है, लेकिन छत्तीसगढ़ में दशहरे से जुड़ी कुछ परंपराएं अलग और विशिष्ट हैं। प्रदेश के मुंगेली जिले के ग्राम कंतेली में दशहरे के दिन रावण दहन के बजाय राजा की सवारी निकाली जाती है, जबकि बेमेतरा जिले के एक गांव में रावण वध दशहरे के अगले दिन किया जाता है।
मुंगेली निवासी प्रशांत शर्मा ने बताया कि मुंगेली शहर से लगभग 10 किलोमीटर दूर स्थित ग्राम पंचायत कंतेली में दशहरा मनाने की यह परंपरा 16वीं सदी से चली आ रही है। यहां कंतेली परिवार की ओर से दशहरे के दिन राजा की सवारी निकाली जाती है। यह सवारी कुल देवी मंदिर पहुंचती है, जहां महालक्ष्मी, महासरस्वती और महाकाली की विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है।
इस आयोजन में 44 गांवों के लोग शामिल होते हैं। पारंपरिक जुलूस के दौरान नाच-गाने और विभिन्न धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। देवी पूजा के बाद ग्रामीण एक-दूसरे से गले मिलकर पर्व की खुशियां साझा करते हैं। वहीं, ग्रामीण राजा को सोनपत्ती अर्पित कर उनका आशीर्वाद लेते हैं।
कंतेली को छत्तीसगढ़ के ऐसे गांव के रूप में जाना जाता है, जहां दशहरे पर रावण दहन के बजाय पारंपरिक पूजा और राजा की सवारी का आयोजन होता है। सदियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी स्थानीय लोगों की आस्था और सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा बनी हुई है।
छत्तीसगढ़ के बेमेतरा जिले में रहने वाले योगेश ने एक अनूठे दर्शाए के बारे में बताते हुए कहा कि, हमारे जिले के एक गांव में भी दशहरा मनाने की अनूठी परंपरा है। यहां रावण का वध विजयादशमी के दिन नहीं, बल्कि उसके अगले दिन किया जाता है। इस आयोजन की खासियत रावण के पुतले को जलाने का तरीका है।
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