बिलासपुर , मार्च 11 -- छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने वैवाहिक विवाद से जुड़े एक मामले में बुधवार को एक अहम निर्णय देते हुए पति-पत्नी को आपसी सहमति से तलाक की मंजूरी दे दी है। अदालत ने यह फैसला दोनों के बीच सुलह की संभावना खत्म होने और दो नाबालिग बेटियों के भविष्य को सुरक्षित रखने के आधार पर सुनाया।
जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस अरविंद कुमार वर्मा की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए मध्यस्थता केंद्र में हुए समझौते को स्वीकार किया। समझौते के अनुसार पति अपनी पत्नी को गुजारा भत्ता के रूप में 51 लाख रुपये देगा, जबकि दोनों बेटियों के नाम पर 15-15 लाख रुपये की फिक्स्ड डिपॉजिट कराई गई है।
मामले के अनुसार, महाराष्ट्र के राजोली निवासी पुरूष और छत्तीसगढ़ की महिला का विवाह 21 मई 2006 को हिंदू रीति-रिवाजों से हुआ था। दंपति की दो बेटियां हैं। विवाह के कुछ वर्षों बाद दोनों के बीच मतभेद बढ़ते गए और अक्टूबर 2018 से वे अलग-अलग रह रहे थे।
पति ने पहले पारिवारिक न्यायालय में क्रूरता के आधार पर तलाक की याचिका दायर की थी, जिसे पर्याप्त साक्ष्य के अभाव में छह जुलाई 2024 को खारिज कर दिया गया। इसके बाद पति ने उच्च न्यायालय में अपील दायर की। सुनवाई के दौरान अदालत ने दोनों पक्षों को मध्यस्थता केंद्र भेजा, जहां लंबी चर्चा के बाद 18 अगस्त 2025 को आपसी सहमति से अलग होने पर सहमति बन गई।
समझौते के तहत पति ने पत्नी को कुल 51 लाख रुपये देने पर सहमति जताई। इसमें से अधिकांश राशि अलग-अलग किस्तों में डिमांड ड्राफ्ट के माध्यम से दी गई और 23 फरवरी 2026 तक शेष 46 लाख रुपये का भुगतान भी पूरा कर दिया गया, जिसे पत्नी ने स्वीकार कर लिया।
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