बैतूल , जुलाई 31 -- मध्यप्रदेश के बैतूल की न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी की अदालत ने चेक बाउंस के एक मामले में आरोपी को दोषमुक्त कर दिया। अदालत ने कहा कि परिवादी कथित ऋण का अस्तित्व, अपनी वित्तीय क्षमता तथा यह तथ्य सिद्ध नहीं कर सका कि विवादित चेक आरोपी ने जारी किए थे।

न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी शिखा शर्मा की अदालत ने राजेश बेले बनाम सतीश बिन्झाड़े (एससीएनआईए क्रमांक 160/2020) प्रकरण में छह जुलाई 2026 को निर्णय सुनाते हुए आरोपी सतीश बिन्झाड़े को आरोपों से बरी कर उसका व्यक्तिगत बंधपत्र निरस्त कर दिया।

प्रकरण के अनुसार परिवादी ने दावा किया था कि आरोपी ने उससे दो लाख रुपये उधार लिए थे और भुगतान के लिए एक-एक लाख रुपये के दो चेक दिए थे। बैंक में प्रस्तुत किए जाने पर दोनों चेक अपर्याप्त निधि के कारण अनादरित हो गए। इसके बाद वैधानिक नोटिस भेजकर परिवाद न्यायालय में प्रस्तुत किया गया।

सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि दोनों पक्षों के बीच कोई वैध ऋण अथवा नकद लेनदेन नहीं हुआ था और परिवादी दो लाख रुपये उधार देने की अपनी वित्तीय क्षमता का विश्वसनीय प्रमाण भी प्रस्तुत नहीं कर सका।

बचाव पक्ष ने यह भी दलील दी कि विवादित चेक आरोपी ने नहीं, बल्कि उसकी पत्नी ने जारी किए थे। अदालत ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 73 के तहत चेकों पर अंकित हस्ताक्षरों की न्यायालयीन अभिलेखों में उपलब्ध आरोपी के हस्ताक्षरों से तुलना की। न्यायालय ने पाया कि चेकों पर केवल इनिशियल थे, जबकि आरोपी के न्यायालयीन अभिलेखों पर पूर्ण हस्ताक्षर थे। इस आधार पर अदालत ने माना कि चेक आरोपी के हस्ताक्षरित सिद्ध नहीं हुए।

अदालत ने अपने निर्णय में उच्चतम न्यायालय के एक निर्णय का उल्लेख करते हुए कहा कि जब परिवादी की वित्तीय क्षमता पर प्रश्न उठता है तो उसका प्रमाण प्रस्तुत करना आवश्यक होता है। चूंकि परिवादी यह सिद्ध करने में असफल रहा कि वैध ऋण के बदले आरोपी ने चेक जारी किए थे, इसलिए परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 139 के तहत उपलब्ध विधिक उपधारणा का लाभ भी उसे नहीं मिल सका। इन आधारों पर अदालत ने आरोपी सतीश बिन्झाड़े को परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 138 के आरोप से दोषमुक्त कर दिया।

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