(अभिजीत मुखोपाध्याय से)नई दिल्ली , जून 16 -- औद्योगिकी रूप से विकसित लोकतांत्रिक देशों के पेरिस स्थित मंच- ऑर्गनाइजेशन ऑफ इकोनॉमिक कोऑपरेशन एंड डेवलपमेंट (ओईसीडी) की जून,2026 की मैजिक (विनिर्माण समूह एवं औद्योगिक कार्पोरेशन्स) डेटाबेस रिपोर्ट में इस तथ्य को उभारा गया कि औद्योगिक सब्सिडी अब वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा का एक हिस्सा बन चुकी है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि जब सरकारों द्वारा दी जाने वाली ऐसी सब्सिडी बड़ी हों, निरंतर दी जा रही हों और लक्ष्य कर के दी जा रही हों, तो वे बाजारों को महत्वपूर्ण रूप से विकृत कर सकती हैं।

रिपोर्ट के आंकड़ों से यह निष्कर्ष निकलता है कि 2005 से 2024 के बीच भारतीय और कुछ अन्य देशों की कंपनियों को चीन की कंपनियों की तुलना में काफी कम सरकारी सहायता प्राप्त हुई। ओईसीडी की औद्योगिक सब्सिडी रिपोर्ट में कहा गया है कि विभिन्न प्रकार की सब्सिडी किसी देश (इस मामले में चीन) के नीतिगत उद्देश्यों को पूरा करने में मदद कर सकती हैं लेकिन उनकी संरचना और लक्ष्यीकरण के आधार पर वे व्यापार और प्रतिस्पर्धा को भी विकृत करती हैं।

इस संदर्भ में भारत (या भारत जैसे किसी देश ) के लिए वास्तविक प्रश्न यह नहीं है कि चीन के सब्सिडी मॉडल को बाहर से कैसे बदला जाए, बल्कि यह है कि भारत बिना अत्यधिक रक्षात्मक या प्रतिशोधात्मक रवैया अपनाए, अपनी कंपनियों की रक्षा कैसे करे, नीतिगत स्वतंत्रता कैसे बनाए रखे और अपनी प्रतिस्पर्धात्मकता को कैसे मजबूत करे ?इसका उत्तर व्यापारिक उपायों, घरेलू क्षमताओं के निर्माण, अधिक बुद्धिमान औद्योगिक नीति और मजबूत अंतरराष्ट्रीय गठबंधनों के संयोजन में निहित है। ओईसीडी की मैजिक डेटाबेस रिपोर्ट इसलिए उपयोगी है क्योंकि यह सरकारों को ऐसे नीतिगत निर्णयों के लिए ठोस साक्ष्य प्रदान करता है।

भारत के लिए इसका मुख्य निहितार्थ यह है कि चीन के उत्पादकों के साथ प्रतिस्पर्धा हमेशा बराबरी का मुकाबला नहीं होती। यदि विदेशी प्रतिस्पर्धियों को अधिक अनुदान, कर रियायतें या बाजार दर से कम लागत पर कर्ज सहायता मिलती है, तो भारतीय कंपनियों को ऐसी लागत व्यवस्था से मुकाबला करना पड़ सकता है जिसकी भरपाई केवल निजी प्रयासों से करना कठिन हो। इसका परिणाम आयातित वस्तुओं पर मूल्य दबाव, घरेलू उत्पादकों के लाभ मार्जिन में कमी और रणनीतिक क्षेत्रों में निवेश के लिए कमजोर प्रोत्साहन के रूप में सामने आता है।

पर इसका मतबल यह नहीं है कि भारत को हर विदेशी सब्सिडी की नकल करनी चाहिए, पर यह समझना जरूरी है कि घरेलू उत्पादकों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में अनुचित असमानताओं के प्रति असुरक्षित न छोड़ा जाए।

ऐसी अनुचित और गैर बराबरी वाली प्रतिस्पर्धा करने के लिए ' प्रतिस्पर्धी की सब्सिडी का मुकाबला बराबर की सब्सिडी राशि' से करने के बजाय ऐसी दूरदर्शी औद्योगिक रणनीति जिससे घरेलू इकाइयां मजबूत हों , विनिर्माण का पैमाना और उत्पादकता बढ़े। भारत में पहले से ही व्यवसायों को समर्थन देने वाली अनेक नीतियां हैं, लेकिन चुनौती उन्हें अधिक लक्षित और साक्ष्य-आधारित तरीके से लागू करने की है।

विदेशी सब्सिडी का सामना करते समय पहली प्रतिक्रिया -एंटी-डंपिंग शुल्क, प्रतिकारी शुल्क (काउंटरवेलिंग ड्यूटी), सुरक्षा उपाय और उन क्षेत्रों में आयात वृद्धि की निगरानी व्यापारिक सुरक्षा उपायों के रूप में होनी चाहिए जहां विदेशी सब्सिडी से उत्पन्न विकृतियां सबसे अधिक दिखाई देती हैं।

दूसरा क्षेत्र घरेलू प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने से जुड़ा है जिसमें अवसंरचना, लॉजिस्टिक्स, बिजली की विश्वसनीयता, कौशल विकास, परीक्षण सुविधाओं, मानकों और तकनीकी अपनाने के लिए समर्थन बढ़ाया जा सकता है। इससे अक्षमता को प्रोत्साहित किए बिना उत्पादन लागत कम की जा सकती है।

तीसरा क्षेत्र अधिक समझदारीपूर्ण वित्तीय सहायता का है और उसे निर्यात क्षमता, तकनीकी उन्नयन, ऊर्जा दक्षता, स्थानीय मूल्य संवर्धन और अनुभव-आधारित सीखने जैसे मापनीय परिणामों से जोड़ा जाना चाहिए।

ओईसीडी की रिपोर्ट के संदर्भ में भारत की पांच स्तंभों वाली व्यावहारिक रणनीति अपना सकता है:जिसमें पहला स्तम्भ आयात-प्रधान क्षेत्रों की निगरानी करने वाली एक सक्रिय सब्सिडी-निगरानी इकाई का निर्माण है। दूसरे स्तम्भ के अंतर्गत "रणनीतिक रूप से प्रतिस्पर्धी" क्षेत्रों को प्राथमिकता दी जाए जहां पैमाने की अर्थव्यवस्था और आपूर्ति श्रृंखला की मजबूती सबसे महत्वपूर्ण है। तीसरा, सार्वजनिक वित्त का उपयोग लॉजिस्टिक्स, बिजली लागत, भूमि उपलब्धता और अनुपालन बोझ जैसी मूल बाधाओं को कम करना , चौथा वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं से जुड़े सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई इकाइयों) के लिए ऋण गारंटी, निर्यात वित्त और तकनीकी उन्नयन सहायता का विस्तार करना और रणनीति का चौथा स्तम्भ विश्व व्यापार संगठन तथा अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उन देशों के साथ सक्रिय सहयोग का है जो सब्सिडी पारदर्शिता और अतिरिक्त उत्पादन क्षमता (ओवरकैपेसिटी) को लेकर समान चिंताएं रखते हैं।

भारत के दृष्टिकोण से ओईसीडी की मैजिक रिपोर्ट को नीति को अधिक प्रभावी बनाने के संकेत के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि इसे बहुत अधिक प्रतिक्रिया का आधार बनाया जाना चाहिए।

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