मुरादाबाद , जून 27 -- वैश्विक व्यापार जगत में चीन और भारत के बीच लॉजिस्टिक्स लागत का एक बड़ा अंतर सामने आया है, जो भारतीय निर्यातकों के लिए किसी बड़ी चेतावनी से कम नहीं है। हाल ही में चीन से लंदन तक भेजे गए मात्र एक किलोग्राम के एक सैंपल ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में हलचल मचा दी है। यह सैंपल चीन से केवल 4 से 15 डॉलर में गंतव्य तक पहुंचा दिया गया, जबकि भारत से इसी तरह के सैंपल को भेजने की लागत 3,500 से 3,700 रुपये (लगभग 42 डॉलर) तक आ रही है। जानकारों का मानना है कि यह अंतर केवल कीमत का नहीं बल्कि दोनों देशों के बीच ढांचागत अंतर को दर्शाता है, जो भारतीय निर्यातकों को पहली व्यावसायिक बातचीत की शुरुआत में ही रेस से बाहर कर देता है। मुरादाबाद हैंडीक्राफ्ट्स एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन (एमएचईए) के अध्यक्ष नवेद उर रहमान ने इस स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि यह भारी अंतर साफ तौर पर संकेत देता है कि भारत को अब अपने निर्यात ढांचे की बुनियाद में सुधार करना होगा।

उन्होंने बताया कि चीन ने छोटे पार्सल भेजने के लिए विशेष रूप से माइक्रो-कंसॉलिडेशन नेटवर्क विकसित किए हैं, जिनमें ई-पैकेट और कैनियाओ सुपर इकोनॉमी जैसे सिस्टम शामिल हैं। ये नेटवर्क लाखों छोटे शिपमेंट्स को एक साथ जोड़कर उनकी कुल लागत को बेहद कम कर देते हैं, लेकिन भारत में छोटे निर्यातकों के लिए फिलहाल ऐसी कोई प्रभावी व्यवस्था मौजूद नहीं है। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारतीय निर्यात ढांचे को अब 'स्मार्ट ट्रेडिंग' और 'सस्टेनेबल लॉजिस्टिक्स' की दिशा में तेजी से कदम बढ़ाने की जरूरत है।

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