(भारत भूषण से)नयी दिल्ली , मई 03 -- बंगाल की खाड़ी में स्थित अंडमान-निकोबार द्वीप समूह अपने प्राकृतिक सौंदर्य, वर्षा वनों की प्रचुरता, दुर्लभ जनजातीय आबादी और अद्वितीय सांस्कृतिक पहचान के लिए देश के समग्र आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिदृश्य में अमूल्य महत्व रखता है, लेकिन अब यह द्वीप समूह देश की सामरिक मजबूती को नयी ऊंचाई देने की ऐतिहासिक दहलीज पर खड़ा है।

लगभग 72,000 करोड़ रुपये की लागत से चल रही 'ग्रेट निकोबार परियोजना' ने सुदूर दक्षिण में स्थित इस द्वीप समूह को देश के रणनीतिक नक्शे के केंद्र में स्थापित कर दिया है। दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री व्यापारिक मार्ग 'मलक्का जलडमरूमध्य' के नजदीक स्थित होने के कारण यह द्वीप समूह वैश्विक व्यापार का नया केंद्र बनने की अद्भुत क्षमता रखता है। इसलिए यह परियोजना केवल एक बुनियादी परियोजना नहीं, बल्कि हिंद महासागर के विशाल जलक्षेत्र में भारत की मौजूदगी को मजबूत करने की रणनीतिक पहल है।

इस परियोजना के मुख्य आकर्षणों में गैलाथिया खाड़ी में बनने वाला एक विशाल अंतरराष्ट्रीय ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल है। इसके साथ ही यहाँ एक आधुनिक ग्रीनफील्ड अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, एक स्मार्ट टाउनशिप और बिजली की जरूरतों को पूरा करने के लिए एक विशाल गैस और सौर ऊर्जा संयंत्र स्थापित किया जाएगा।

परियोजना के रणनीतिक और आर्थिक महत्व के बावजूद, इसके पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों को लेकर समय-समय पर कई सवाल भी उठते रहे हैं, जिस पर सरकार ने स्पष्टीकरण जारी किये हैं और चिंताओं को दूर करने का प्रयास किया है। पर्यावरणविदों का तर्क है कि निर्माण कार्य से यहाँ के प्राचीन वर्षा वनों और दुर्लभ प्रजातियों के आवास को नुकसान पहुँच सकता है। गैलाथिया खाड़ी को लेकर विशेष रूप से कई आपत्तियां दर्ज कराई गई हैं, जो 'जायंट लेदरबैक' कछुओं के लिए दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण प्रजनन स्थलों में से एक है।

एक और बड़ा सवाल यहाँ की मूल जनजातियों, विशेष रूप से 'शॉम्पेन' और 'निकोबारी' समुदायों के भविष्य को लेकर उठाया जाता रहा है कि आधुनिक विकास की होड़ में इनकी सांस्कृतिक पहचान और प्राकृतिक निवास न प्रभावित हो जाएं।

हाल ही लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने भी इस परियोजना को लेकर सवाल खड़े किये हैं, जिससे यह परियोजना फिर से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में आ गयी है। हालांकि, इन चिंताओं का समाधान करने के लिए सरकार ने भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (जेएसआई) और भारतीय वन्यजीव संस्थान जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों के नेतृत्व में पहले ही एक अत्यंत विस्तृत और वैज्ञानिक रूप से ठोस कार्ययोजना तैयार की है। पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन करते हुए सरकार ने यह सुनिश्चित किया है कि विकास के लिए द्वीप के कुल वन क्षेत्र का मात्र 1.82 प्रतिशत हिस्सा ही उपयोग में लिया जाए, ताकि पारिस्थितिक तंत्र पर न्यूनतम प्रभाव पड़े।

वन क्षेत्र की भरपाई के लिए एक अभूतपूर्व 'प्रतिपूरक वनीकरण' योजना भी लागू की गई है। चूंकि अंडमान निकोबार में पहले से ही 75 प्रतिशत से अधिक वन क्षेत्र है, इसलिए नियमों के तहत इसकी भरपाई हरियाणा और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में हज़ारों हेक्टेयर भूमि पर वनीकरण करके की जा रही है। हरियाणा के अरावली क्षेत्र में किया जा रहा यह वनीकरण पारिस्थितिक संतुलन तथा देश के वन क्षेत्र को बनाए रखने की दिशा में एक बड़ा कदम है।

जनजातीय हितों के संरक्षण के मामले में भी बेहद संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाया गया है। जारवा और शॉम्पेन नीतियों का कड़ाई से पालन करते हुए यह स्पष्ट किया गया है कि किसी भी आदिवासी का विस्थापन नहीं होगा। बल्कि, परियोजना के नक्शे में इस तरह बदलाव किए गए हैं कि जनजातीय आरक्षित क्षेत्र में करीब 3.9 वर्ग किमी की शुद्ध वृद्धि हुई है। यह विकास के उस समावेशी मॉडल को दर्शाता है जहाँ प्रगति के साथ-साथ प्राचीन विरासत को भी सहेजा जाता है।

सामरिक दृष्टि से देखें तो ग्रेट निकोबार भारत के लिए एक 'अजेय दुर्ग' की तरह है। हिंद महासागर में बढ़ती विदेशी सैन्य गतिविधियों और चीन की 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' जैसी रणनीतियों का मुकाबला करने के लिए यह द्वीप भारत के लिए एक स्थिर विमानवाहक पोत के रूप में कार्य करेगा। यहाँ से भारत न केवल अपने समुद्री व्यापार मार्गों की रक्षा कर सकेगा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में भारत की सैन्य धाक भी और मजबूत होगी।

आर्थिक मोर्चे पर, यह परियोजना भारत की 'ब्लू इकोनॉमी' को एक नई गति प्रदान करेगी। वर्तमान में भारत का अधिकांश ट्रांसशिपमेंट कार्गो विदेशी बंदरगाहों जैसे कोलंबो या सिंगापुर से होकर गुजरता है। गैलाथिया खाड़ी में टर्मिनल बनने से भारत हर साल अरबों डॉलर की विदेशी मुद्रा बचाने में सक्षम होगा। इसके अलावा, यहाँ बनने वाली टाउनशिप और पर्यटन केंद्रों से हज़ारों स्थानीय युवाओं के लिए रोज़गार के नए द्वार खुलेंगे।

राष्ट्रीय हरित अधिकरण और विभिन्न स्वतंत्र विशेषज्ञ समितियों ने भी इस परियोजना की गहन न्यायिक और तकनीकी जांच की है और उनका मानना है कि यह परियोजना राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक आत्मनिर्भरता के लिए अनिवार्य है। आधुनिक भारत के निर्माण की दिशा में यह एक ऐसा संतुलित मार्ग है, जो सामरिक संप्रभुता, आर्थिक समृद्धि और पर्यावरणीय नैतिकता को लेकर चलने के साथ-साथ वहाँ की स्थानीय आबादी के हितों को भी सुरक्षित एवं संरक्षित रखता है।

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