मथुरा , मार्च 1 -- उत्तर प्रदेश में कान्हा नगरी मथुरा के गोकुल में रविवार को विश्व प्रसिद्ध 'छड़ी मार होली' का आयोजन उल्लास और भक्ति भाव के साथ किया गया। बरसाना और नंदगांव की लठमार होली के बाद ब्रज में फाल्गुन की मस्ती अपने चरम पर पहुंच गई है और गोकुल में प्रेम व वात्सल्य की अनूठी छटा बिखरी। उत्सव की शुरुआत ऐतिहासिक नंद भवन से हुई। यहां ठाकुर जी को भव्य पालकी डोला में विराजमान कर ढोल-नगाड़ों और 'नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की' के जयघोष के बीच शोभायात्रा निकाली गई। ग्वाल-बालों की टोली झूमती-गाती नंद चौक पहुंची, जहां हुरियारिनें गोपियां हाथों में छड़ियां लिए स्वागत के लिए खड़ी थीं।
गोकुल की होली की सबसे बड़ी विशेषता इसकी कोमलता है। मान्यता है कि यहां भगवान श्रीकृष्ण बाल रूप में विराजमान हैं, इसलिए गोपियां अपने लाडले कान्हा को चोट न पहुंचे, इस भाव से लाठी की जगह कोमल छड़ियों से सांकेतिक प्रहार करती हैं। नंद चौक पर गोपियों और हुरियारों के बीच हंसी-ठिठोली और परंपरागत रस्मों का मनोहारी दृश्य देखने को मिला।
छड़ी मार होली के बाद नंद चौक स्थित 'भगवान के बगीचे' में रंगोत्सव आयोजित हुआ। मंदिर के पुजारियों ने टेसू के फूलों से तैयार प्राकृतिक रंगों की बौछार की, जिससे पूरा वातावरण केसरिया और पीले रंग में रंग गया। विदेशी पर्यटकों सहित हजारों श्रद्धालु इस भक्ति रस में सराबोर नजर आए।
स्थानीय निवासियों के अनुसार यहां प्रयोग किया जाने वाला टेसू का रंग महीनों की मेहनत से तैयार किया जाता है। यह पूरी तरह प्राकृतिक और त्वचा के लिए लाभकारी होता है। ब्रज के मंदिरों में आज भी रासायनिक रंगों के बजाय पारंपरिक टेसू के रंगों को प्राथमिकता दी जाती है। इस प्रकार गोकुल की छड़ी मार होली ने प्रेम, वात्सल्य और भक्ति का अद्भुत संगम प्रस्तुत करते हुए ब्रज की सांस्कृतिक परंपरा को जीवंत कर दिया।
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