चंडीगढ़ , अगस्त 25 -- केंद्र सरकार द्वारा गेहूं, गेहूं के आटे, मैदा, सूजी और संबंधित उत्पादों पर लगे निर्यात प्रतिबंध हटाये जाने पर पंजाब सरकार के पूर्व विशेष मुख्य सचिव एवं सेवानिवृत्त अधिकारी केबीएस सिद्धू ने सवाल उठाते हुए कहा कि यह कृषि व्यापार नीति में किसानों को निर्णय प्रक्रिया से बाहर रखने का एक और उदाहरण है।
केंद्र सरकार ने 24 अगस्त को अधिसूचना जारी कर इन उत्पादों पर लगे निर्यात प्रतिबंधों को हटा दिया था। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए श्री सिद्धू ने मंगलवार को कहा कि कृषि जिंसों के निर्यात-आयात से जुड़े महत्वपूर्ण फैसले अक्सर केंद्र सरकार द्वारा उपभोक्ताओं अथवा संबंधित उद्योगों के हितों को ध्यान में रखकर लिए जाते हैं, लेकिन किसानों को निर्णय प्रक्रिया में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिलता। उन्होंने कहा कि निर्यात प्रतिबंध लगाने और हटाने के फैसले सरकार के विवेक पर लिये जाते हैं। निर्णय से पहले किसानों को कोई जानकारी नहीं दी जाती और न ही यह आकलन किया जाता है कि ऐसे फैसलों का उनकी आय पर कितना असर पड़ेगा। उन्होंने कहा कि आर्थिक दृष्टि से इन नीतिगत फैसलों की कीमत अंततः किसान को ही चुकानी पड़ती है।
श्री सिद्धू ने कहा कि यह समस्या केवल गेहूं तक सीमित नहीं है। उन्होंने कपास के लिए इस वर्ष शुरू की गयी शुल्क-मुक्त आयात व्यवस्था का उल्लेख करते हुए कहा कि इसका समय पंजाब की कपास फसल के मंडियों में पहुंचने के दौरान रखा गया। उन्होंने चीनी क्षेत्र का उदाहरण देते हुए कहा कि सरकार ने नवंबर 2025 में निर्यात की अनुमति से लेकर मई 2026 में पूर्ण निर्यात प्रतिबंध और फिर अगस्त में शुल्क-मुक्त आयात कोटे तक नीतियों में कई बदलाव किये, जबकि गन्ना किसानों को मिलने वाली कीमत में अपेक्षित बदलाव नहीं हुआ।
श्री सिद्धू ने अपने दावे के समर्थन में कृषि व्यापार नीतियों से संबंधित शोध का हवाला देते हुए कहा कि पूर्व कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) अध्यक्ष डॉ अशोक गुलाटी और उनके सह-लेखकों के अध्ययन के अनुसार, वर्ष 2023 में लागू किये गये प्रतिबंधात्मक व्यापार उपायों से भारतीय किसानों को लगभग 39,829 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। उन्होंने कहा कि इस अध्ययन में गैर-बासमती चावल के निर्यात पर प्रतिबंध, गेहूं पर स्टॉक सीमा तथा प्याज और उसना चावल पर निर्यात प्रतिबंध जैसे उपायों के प्रभाव का आकलन किया गया था।
उन्होंने पूर्व ओईसीडी- आईसीआरआईईआर शोध का भी हवाला देते हुए कहा कि वर्ष 2000-01 से 2016-17 के दौरान प्रतिबंधात्मक व्यापार और विपणन नीतियों के कारण भारतीय किसानों पर औसतन लगभग 2.65 लाख करोड़ रुपये प्रतिवर्ष का अप्रत्यक्ष बोझ पड़ा था। उनके अनुसार, यह राशि पूरी अवधि में करीब 45 लाख करोड़ रुपये बैठती है।
श्री सिद्धू ने कहा कि कृषि व्यापार संबंधी नीतिगत फैसलों से पहले किसानों की आय पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव का आकलन करने के लिए एक औपचारिक संस्थागत तंत्र बनाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जैसे वित्त विधेयक के साथ उसके राजस्व प्रभावों का विवरण दिया जाता है, उसी तरह विदेश व्यापार महानिदेशालय की ओर से जारी होने वाली कृषि व्यापार अधिसूचनाओं के साथ किसानों पर संभावित प्रभाव का आकलन भी सार्वजनिक किया जाना चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि यदि किसी नीति से उपभोक्ताओं, उद्योग या राजकोष को लाभ मिलता है, तो यह भी तय किया जाना चाहिए कि उस लाभ का उचित हिस्सा उस किसान तक किस प्रकार पहुंचाया जाए जिसकी उपज की कीमत पर उस नीति का प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।
श्री सिद्धू ने कहा कि इतने बड़े आर्थिक प्रभावों के बावजूद किसानों पर पड़ने वाले व्यापार नीति के असर को अभी तक एक स्थायी और संरचनात्मक मुद्दे के रूप में पर्याप्त गंभीरता से नहीं लिया गया है। उन्होंने कहा कि अलग-अलग कृषि जिंसों से जुड़ी शिकायतों को अलग-अलग घटनाओं के बजाय एक व्यापक कृषि व्यापार नीति के हिस्से के रूप में देखा जाना चाहिए।
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