अमृतसर , मार्च 09 -- गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी (जीएनडीयू), अमृतसर के कुलपति प्रो करमजीत सिंह के संरक्षण में, विश्वविद्यालय ने सोमवार को हिरोशिमा यूनिवर्सिटी, जापान के 'ग्रेजुएट स्कूल ऑफ ह्यूमैनिटीज एंड सोशल साइंसेज' में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर योशिदा ओसामु द्वारा एक विशेष शैक्षणिक व्याख्यान का आयोजन किया।
गुरु नानक भवन के कॉन्फ्रेंस हॉल में आयोजित इस व्याख्यान का विषय 'एक वैश्विक लेकिन खंडित दुनिया मंथ अंतरराष्ट्रीय संबंध: भारत और जापान की भूमिका' था, जिसमें संकाय सदस्यों, शोध विद्वानों और छात्रों ने भाग लिया।
यह कार्यक्रम आर्ट्स एंड सोशल साइंसेज के डीन और राजनीति विज्ञान विभाग के प्रमुख प्रो सतनाम सिंह देओल और स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज के प्रमुख डॉ गुरशमिंदर सिंह बाजवा की उपस्थिति में आयोजित किया गया। उन्होंने विशिष्ट अतिथि का स्वागत और सम्मान किया और छात्रों औश्र विद्वानों के बीच वैश्विक दृष्टिकोण को बढ़ावा देने में ऐसी शैक्षणिक अंतःक्रियाओं के महत्व की सराहना की।
अतिथि का स्वागत करते हुए प्रो सतनाम सिंह देओल ने अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक जुड़ाव के महत्व पर प्रकाश डाला और जोर दिया कि दुनिया भर के विद्वानों के साथ बातचीत से अनुसंधान सहयोग को मजबूत करने और छात्रों और संकाय सदस्यों के बौद्धिक क्षितिज को व्यापक बनाने में मदद मिलती है। प्रोफेसर योशिदा ओसामु, जिनके साथ उनकी पत्नी श्रीमती कामिया शिहोमी भी थीं, को शैक्षणिक समुदाय के साथ अपने विचार साझा करने के लिए प्रशंसा के प्रतीक के रूप में स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।
प्रोफेसर योशिदा और श्रीमती कामिया ने अपनी यात्रा के दौरान कुलपति प्रो. करमजीत सिंह के साथ एक विशेष बातचीत भी की, जहां उन्होंने दोनों संस्थानों के बीच शैक्षणिक सहयोग की भविष्य की संभावनाओं पर चर्चा की। कुलपति ने कहा कि गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी लगातार अपनी शैक्षणिक पहुंच का विस्तार कर रही है और अपने शोधकर्ताओं और छात्रों के लिए बेहतर वैश्विक अवसर प्रदान करने के लिए हमेशा प्रतिबद्ध है।
कुलपति प्रो. करमजीत सिंह ने टिप्पणी की कि ऐसे व्याख्यान छात्रों और विद्वानों को नवीनतम वैश्विक घटनाक्रम और अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भारत की भूमिका के बारे में बहुमूल्य जानकारी प्रदान करने में बहुत सहायक होते हैं।
अपने व्याख्यान के दौरान, प्रोफेसर योशिदा ओसामु ने वैश्वीकरण की बदलती प्रकृति और समकालीन अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर चर्चा की। उन्होंने रेखांकित किया कि हालांकि वैश्वीकरण ने देशों के बीच आर्थिक और राजनीतिक संबंधों को बढ़ाया है, लेकिन इसने जरूरी नहीं कि एक एकीकृत वैश्विक समुदाय बनाया हो। इसके बजाय, आज की दुनिया आपस में जुड़ी होने के बावजूद आर्थिक असमानताओं, राष्ट्रीय हितों और राजनीतिक प्राथमिकताओं के कारण विभाजित है।उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद वैश्विक आर्थिक प्रणाली के विकास का भी पता लगाया, जिसमें ब्रेटन वुड्स प्रणाली, 1971 के 'निक्सन शॉक' और फ्लोटिंग विनिमय दरों के संक्रमण जैसे महत्वपूर्ण घटनाक्रमों का उल्लेख किया। उन्होंने समझाया कि इन बदलावों ने वैश्विक आर्थिक संबंधों को महत्वपूर्ण रूप से नया आकार दिया और वैश्विक पूंजीवाद की दिशा को प्रभावित किया।
दक्षिण एशिया का संदर्भ देते हुए, प्रोफेसर योशिदा ने नोट किया कि शीत युद्ध की अवधि के दौरान भारत अपनी गुटनिरपेक्ष विदेश नीति और आत्मनिर्भर आर्थिक दृष्टिकोण के कारण वैश्विक आर्थिक प्रतिस्पर्धा से तुलनात्मक रूप से अलग रहा। हालांकि, 1991 के आर्थिक उदारीकरण ने भारत के लिए वैश्विक अर्थव्यवस्था में एकीकृत होने के नये अवसर खोले। उन्होंने पूर्वी एशिया में बदलती भू-राजनीतिक गतिशीलता पर भी प्रकाश डाला और इंडो-पैसिफिक क्षेत्रमें स्थिरता और संवाद को बढ़ावा देने में भारत-जापान सहयोग के बढ़ते महत्व पर जोर दिया। उनके अनुसार, दोनों देश शांतिपूर्ण जुड़ाव और संतुलित अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को प्रोत्साहित करने में रचनात्मक भूमिका निभा सकते हैं।
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