लुधियाना , सितंबर 10 -- वर्ष 2022 में उत्तर भारत में कहर बरपाने के बाद गांठदार त्वचा रोग (एलएसडी) एक बार फिर पंजाब में मवेशियों मुख्य रूप से दुधारू पशुओं में फैल रहा है। गुरु अंगद देव पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. जे.पी.एस. गिल ने गुरुवार को पशुपालकों से रोग की रोकथाम के लिए पशु फार्मों पर जैव सुरक्षा और स्वच्छता के उपाय मजबूत करने की अपील की।
पशु चिकित्सा विज्ञान महाविद्यालय के डीन डॉ स्वर्ण सिंह रंधावा ने बताया कि यह कैप्रिपॉक्स वायरस से होने वाला विषाणुजनित रोग है, जो मच्छरों, काटने वाली मक्खियों और किलनी जैसे वाहकों से फैलता है। इसके प्रमुख लक्षणों में तेज बुखार और शरीर पर दो से पांच सेंटीमीटर आकार की गांठें बनना शामिल है। कुछ मामलों में मुंह, गले और श्वसन तंत्र प्रभावित होने के साथ निमोनिया, लसीका ग्रंथियों में सूजन और पैरों या छाती के निचले हिस्से में सूजन हो सकती है। उन्होंने बताया कि रोग के कारण पशु की भूख कम हो जाती है, मुंह से लार टपकती है, आंखों और नाक से पानी आता है तथा दूध उत्पादन में भारी कमी हो सकती है। उन्होंने कहा कि विषाणुजनित रोग होने के कारण इसका कोई सीधा उपचार नहीं है। बुखार वाले पशु को स्थानीय पशु चिकित्सक की सलाह से बुखार कम करने वाली दवाएं दी जा सकती हैं। लगातार बुखार या श्वसन संबंधी लक्षण होने पर द्वितीयक संक्रमण रोकने के लिए चिकित्सकीय सलाह से एंटीबायोटिक दी जा सकती है। रोग के प्रसार को रोकने के लिए रोग वाहक कीटों पर नियंत्रण जरूरी है।
विश्वविद्यालय की पशु चिकित्सा चिकित्सा विभाग की प्रमुख डॉ सुषमा ने पशुओं की आवाजाही तथा खरीद-फरोख्त में सावधानी बरतने की सलाह दी। उन्होंने पशुपालकों से पशुपालन विभाग के टीकाकरण अभियान में सहयोग करने और स्वस्थ पशुओं को एलएसडी का टीका लगवाने की अपील की। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह रोग मनुष्यों में नहीं फैलता और दूध को अच्छी तरह उबालने या पाश्चुरीकरण के बाद सेवन किया जा सकता है।
विश्वविद्यालय की ओर से 18-19 सितंबर 2026 को 'जैव सुरक्षा मजबूत करें- पशु रोगों से बचाव करें' विषय पर पशुपालन मेला आयोजित किया जाएगा, जिसमें पशुपालकों को जैव सुरक्षा संबंधी उपायों के प्रति जागरूक किया जाएगा।
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