गरियाबंद , सितंबर 21 -- छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले में उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले 17 गांवों के स्वैच्छिक विस्थापन की प्रक्रिया तेज कर दी गई है। देवझर अमली और जुगाड़ गांव के ग्रामीणों ने विस्थापन के लिए सहमति जताई है। प्रशासन अब इच्छुक परिवारों के चिन्हांकन, सत्यापन, पुनर्वास के लिए भूमि चयन और बुनियादी सुविधाओं की व्यवस्था की प्रक्रिया आगे बढ़ाएगा।

कलेक्टर परिसर में इस संबंध में जिला स्तरीय क्रियान्वयन समिति की बैठक कलेक्टर रणबीर शर्मा की मौजूदगी में हुई। बैठक में उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व के उपनिदेशक वरुण जैन सहित संबंधित विभागों के अधिकारी-कर्मचारी और विस्थापन क्षेत्र में आने वाले गांवों के ग्रामीण शामिल हुए। इस दौरान पुनर्वास, भूमि चयन और आवश्यक बुनियादी सुविधाओं को लेकर विस्तार से चर्चा की गई।

बैठक में देवझर अमली और जुगाड़ के ग्रामीणों ने स्वैच्छिक विस्थापन के प्रति सहमति व्यक्त की। प्रशासन ने इच्छुक परिवारों का चिन्हांकन कर 45 दिनों के भीतर सत्यापन की प्रक्रिया पूरी करने की योजना पर चर्चा की। ग्रामीणों को दावे-आपत्तियां प्रस्तुत करने का अवसर भी दिया जाएगा। इसके साथ पुनर्वास के लिए नई भूमि के चिन्हांकन की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी, ताकि आवश्यकता के अनुसार वन भूमि डायवर्जन का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा जा सके।

बैठक में अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि विस्थापन की प्रक्रिया पूरी तरह स्वैच्छिक होगी और जो ग्रामीण विस्थापित नहीं होना चाहते, उन पर किसी प्रकार का दबाव नहीं बनाया जाएगा। विस्थापन से पहले पात्र परिवारों के लिए भूमि और आवश्यक सुविधाओं की व्यवस्था सुनिश्चित करने पर जोर दिया गया।

पुनर्वास स्थलों पर सड़क, बिजली, स्कूल, पेयजल, आंगनबाड़ी, सामुदायिक केंद्र और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र जैसी सुविधाएं विकसित करने पर भी चर्चा हुई। इसके अलावा चारागाह और निस्तार की व्यवस्था तथा ऐसे पुनर्वास स्थल के चयन पर जोर दिया गया, जहां मानव-वन्यजीव संघर्ष की आशंका कम हो।

बैठक में शामिल देवझर अमली के ग्रामीण पुष्तम मांझी के अनुसार गांव में कुल 156 परिवार हैं, जिनमें करीब 120 परिवार विस्थापन के लिए तैयार हैं, जबकि लगभग 30 से 35 परिवार गांव में ही रहना चाहते हैं। जुगाड़ गांव की 60 प्रतिशत से अधिक आबादी के भी विस्थापन के लिए इच्छुक होने की जानकारी सामने आई है।

बैठक में बारनवापारा क्षेत्र में पूर्व में हुए विस्थापन का उदाहरण भी रखा गया। वन विभाग के अधिकारियों ने बताया कि करीब 10 वर्ष पहले तीन गांवों के परिवार विस्थापन प्रक्रिया में शामिल हुए थे। पुनर्वास के बाद इन परिवारों की आर्थिक स्थिति और जीवनशैली में आए बदलावों की जानकारी भी ग्रामीणों को दी गई।

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