वाराणसी , अप्रैल 01 -- धार्मिक नगरी काशी के बहुचर्चित "गंगा जी में नाव पर रोजा इफ्तार पार्टी" में चिकन बिरयानी खाकर अवशेष गंगा नदी में फेंकने के आरोप में 14 अभियुक्तों की जमानत याचिका को आलोक कुमार, अपर सत्र न्यायाधीश, न्यायालय संख्या-6 ने बुधवार को खारिज कर दिया।
न्यायालय ने सभी 14 अभियुक्तों द्वारा दायर प्रथम जमानत प्रार्थना-पत्र को निरस्त कर दिया। अधिवक्ता शशांक शेखर त्रिपाठी ने बताया कि यह मामला थाना कोतवाली में दर्ज मुकदमे से संबंधित है जिसमें भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धाराएं 298, 299, 196(1)(बी), 279, 223(b), 308(5) तथा सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 67 सहित अन्य प्रावधानों के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है।
वादी रजत जायसवाल ने आरोप लगाया था कि गंगा नदी की पवित्र धारा में नाव पर इफ्तार पार्टी आयोजित की गई, जिसमें चिकन बिरयानी का सेवन किया गया और उसके अवशेष गंगा में फेंक दिए गए। इस कृत्य से न केवल धार्मिक भावनाओं को आहत किया गया, बल्कि सामाजिक सौहार्द भी प्रभावित हुआ।
अभियोजन पक्ष की ओर से सरकारी अधिवक्ता संतोष तिवारी ने प्रभावी बहस की। उनके साथ वादी पक्ष के अधिवक्ता शशांक शेखर त्रिपाठी, राजकुमार तिवारी, राजेश त्रिवेदी, नित्यानंद राय एवं आशुतोष शुक्ला ने भी न्यायालय के समक्ष विस्तृत तर्क रखे।
अभियोजन ने तर्क दिया कि यह कृत्य जानबूझकर किया गया ताकि एक विशेष समुदाय की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाई जा सके। घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर प्रसारित कर व्यापक जनाक्रोश फैलाया गया। गंगा नदी हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र मानी जाती है। उसमें मांसाहार का सेवन करना और अवशेष फेंकना गंभीर आपत्तिजनक कृत्य है। यह मात्र व्यक्तिगत कृत्य नहीं, बल्कि सामाजिक वैमनस्य फैलाने का प्रयास है।
मामले की जांच के दौरान पुलिस ने सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो के आधार पर अभियुक्तों की पहचान की। प्रत्यक्षदर्शियों के बयान भी दर्ज किए गए, जिनमें नाव पर इफ्तार पार्टी आयोजित करने और मांसाहार करने की पुष्टि हुई। बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि इस घटना को राजनीतिक रंग दिया जा रहा है। अभियुक्त निर्दोष हैं और उन्हें झूठा फंसाया गया है। वीडियो की प्रमाणिकता संदिग्ध है तथा अभियुक्तों का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद न्यायालय ने अपने आदेश में महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं। न्यायालय ने कहा कि यह मामला केवल एक साधारण घटना नहीं, बल्कि सार्वजनिक शांति और सामाजिक सौहार्द से जुड़ा हुआ गंभीर प्रकरण है। गंगा नदी की धार्मिक महत्ता को ध्यान में रखते हुए इस प्रकार का कृत्य अत्यंत गंभीर माना गया। सोशल मीडिया के माध्यम से घटना का प्रसार अपराध की गंभीरता को और बढ़ाता है। प्रथम दृष्टया साक्ष्य अभियुक्तों के विरुद्ध पाए गए हैं।
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