वाराणसी , सितंबर 4 -- श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर काशी में भगवान शिव के कृष्ण स्वरूप का अनूठा श्रृंगार किया गया। टेढ़ीनीम स्थित महंत आवास में काशीपुराधीश्वर बाबा विश्वनाथ की चल प्रतिमा को 'हरि' स्वरूप में सजाकर झूले पर विराजमान किया गया। मोरपंख मुकुट, आकर्षक वस्त्र और बांसुरी की छवि से सजे बाबा विश्वनाथ के इस मनोहारी स्वरूप के दर्शन के लिए श्रद्धालु उमड़ पड़े।
काशी की इस परंपरा में शिव और विष्णु के अभेद स्वरूप का दर्शन कराया जाता है। त्रिशूल और डमरू धारण करने वाले महादेव को इस अवसर पर मोरपंखधारी कृष्ण के रूप में सजाया गया। कैलाश की गंभीरता और वृंदावन की माधुर्य भक्ति के इस संगम ने जन्माष्टमी के उत्सव को विशेष बना दिया।
इस अवसर पर भजन-कीर्तन के दौरान "गंगा की तीरे झूला झूलें त्रिपुरारी, बनके आज वो कुंजबिहारी" सहित अन्य भजनों की प्रस्तुति की गई। भजनों के माध्यम से भगवान शिव के कृष्ण स्वरूप का गुणगान किया गया। श्रद्धालुओं ने 'हर-हर महादेव' और 'हरे कृष्ण' के जयघोष के बीच बाबा विश्वनाथ के झूलन स्वरूप के दर्शन किए।
झूले पर विराजमान बाबा विश्वनाथ को बाल गोपाल के प्रिय माखन-मिश्री का भोग अर्पित किया गया। महंत आवास में इस दौरान भक्ति और वात्सल्य का वातावरण बना रहा।
महंत वाचस्पति तिवारी ने बताया कि जन्माष्टमी के अवसर पर परंपरा के अनुसार ब्रह्ममुहूर्त में बाबा विश्वनाथ की चल प्रतिमा का विशेष पूजन किया गया। पंडित सुशील त्रिपाठी के आचार्यत्व में वैदिक ब्राह्मणों ने मंत्रोच्चार के बीच विधिवत पूजन-अर्चन संपन्न कराया।
सायंकाल संजीव रत्न मिश्र ने बाबा विश्वनाथ का मनोहारी 'हरि' स्वरूप में श्रृंगार किया। इसके बाद पारंपरिक लोकगीतों और भजनों के माध्यम से बाबा के चरणों में शिवांजलि अर्पित की गई।
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