(जयंत रॉय चौधरी से)नयी दिल्ली , अप्रैल 03 -- भारत के नये स्टील्थ नौसैनिक फ्रिगेट आईएनएस तारागिरी को बेड़े में शामिल करने से ठीक पहले रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने अपने सोशल मीडिया हैंडल पर एक संक्षिप्त और रहस्यमयी संदेश पोस्ट किया - "यह कोई शब्द नहीं, यह शक्ति है, यह अरिदमन है" - जिसने भारत के तेजी से बढ़ते परमाणु पनडुब्बी कार्यक्रम पर सबका ध्यान खींच लिया है। मिसाइल और ड्रोन हमलों के इस दौर में यह कार्यक्रम भारत के रणनीतिक प्रतिरोध ढांचे का मुख्य आधार है।

भारत की तीसरी परमाणु संचालित बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बी (एसएसबीएन) आईएनएस अरिदमन वर्तमान में समुद्री परीक्षणों से गुजर रही है। नौसैनिक विश्लेषकों ने इस पोस्ट का अर्थ यह निकाला है कि इसके परीक्षण 'पूरी तरह सफल रहे हैं'।

इस प्रयास के केंद्र में 'एडवांस्ड टेक्नोलॉजी वेसल' (एटीवी) परियोजना है। इसके तहत भारत परमाणु संचालित बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बियों का एक बेड़ा तैयार कर रहा है। इसका उद्देश्य एक विश्वसनीय 'सेकंड-स्ट्राइक' क्षमता (परमाणु हमले के बाद जवाबी कार्रवाई की क्षमता) सुनिश्चित करना है।

भारत वर्तमान में दो एसएसबीएन का संचालन करता है- 2016 में शामिल किया गया आईएनएस अरिहंत और अगस्त 2024 में शामिल किया गया आईएनएस अरिघात। इस कार्यक्रम की प्रमुख पनडुब्बी 'अरिहंत' ने 2018 में अपना पहला निवारक गश्त पूरा किया था। इसके साथ ही भारत उन चुनिंदा देशों के समूह में शामिल हो गया, जिनके पास परिचालन परमाणु ट्रायड (जल, थल और नभ से परमाणु हमले की क्षमता) है।

आईएनएस अरिदमन (कोडनेम S4 प्रोजेक्ट) अपनी पूर्ववर्ती पनडुब्बियों की तुलना में बड़ी और अधिक सक्षम है। उम्मीद है कि इसे आने वाले कुछ हफ्तों में औपचारिक रूप से नौसेना में शामिल कर लिया जायेगा। यह के-15 कम दूरी की और के-4 मध्यम दूरी की सबमरीन-लॉन्च बैलिस्टिक मिसाइलों (एसएलबीएम) से लैस होगी, जिनकी मारक क्षमता 3,500 किलोमीटर है, जो भारत की पहुंच को काफी बढ़ा देगी।

चौथी पनडुब्बी आईएनएस अरिसूदन को माना जा रहा है। इसका कोडनेम 'S4 एस्टरिक्स' है। इसे पहले ही लॉन्च किया जा चुका है और यह भी परीक्षणों के दौर में है। इसे 2027 की शुरुआत तक नौसेना में शामिल किये जाने की संभावना है।

विशाखापत्तनम में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने आज जिस स्टील्थ फ्रिगेट को लॉन्च किया, वह मझगांव डॉक्स में निर्मित नीलगिरी श्रेणी का मिसाइल फ्रिगेट है। इस जहाज का निर्माण 2020 में शुरू हुआ था और इसे 2022 में लॉन्च किया गया था।

व्यापक समुद्री परीक्षणों के बाद इसे नौसेना में शामिल किया जाना एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। ब्रह्मोस और अन्य मिसाइलों से लैस यह 7,000 टन का जहाज उन समुद्री क्षेत्रों में भारत की नौसैनिक उपस्थिति को और मजबूती देगा, जहां भारत का परिचालन है।

रक्षा मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों ने कहा, "दो नयी परमाणु पनडुब्बियां महत्वपूर्ण विकासवादी कदम का हिस्सा हैं, जिन्हें अभी शामिल किया जाना बाकी है। इन्हें हम 'अरिहंत-स्ट्रेच' वेरिएंट कहते हैं, जो मूल अरिहंत-श्रेणी और भविष्य के अधिक महत्वाकांक्षी प्लेटफार्मों के बीच के अंतर को पाटेंगी।"लगभग 7,000 से 11,000 टन के अनुमानित विस्थापन और बेहतर परमाणु रियेक्टरों के साथ, ये नये बोट अधिक समय तक पानी के भीतर रहने की क्षमता, पकड़ में न आने की तकनीक और प्रहार क्षमता प्रदान करती हैं।

अधिकारियों ने बताया, "ये परियोजनाएं स्वदेशीकरण की दिशा में भी बड़ी छलांग हैं। इनमें लगभग 75 प्रतिशत पुर्जे घरेलू स्तर पर जुटाये गये हैं, जो भारत की रक्षा औद्योगिक नीति का प्रमुख उद्देश्य है।"अरिहंत शृंखला से आगे भारत पहले से ही अपनी अगली बड़ी छलांग की योजना बना रहा है। इसके बारे में सूत्रों का कहना है कि यह 'एस5-श्रेणी' की एसएसबीएन पनडुब्बियां होंगी। ये काफी बड़ी पनडुब्बियां होंगी। इनका विस्थापन लगभग 13,500 टन होगा और खबरों के अनुसार, ये 16 मिसाइलों तक ले जाने में सक्षम होंगी। इनमें लंबी दूरी की के-5 और के-6 एसएलबीएम मिसाइलें शामिल होंगी, जिनकी संभावित मारक क्षमता 5,000 से 8,000 किलोमीटर तक होगी।

इनका निर्माण 2027 के आसपास शुरू होने की उम्मीद है और पहली पनडुब्बी के 2030 के दशक की शुरुआत में शामिल होने की संभावना है। ये प्लेटफॉर्म भारत को समुद्र-आधारित वास्तविक अंतरमहाद्वीपीय निवारक क्षमता प्रदान करेंगे, जिससे दुश्मन के इलाके में गहराई तक लक्ष्य साधने की भारत की क्षमता बढ़ जायेगी।

इसके समानांतर भारत 'प्रोजेक्ट-77' के तहत परमाणु संचालित हमलावर पनडुब्बियों (एसएसएन) के बेड़े पर भी काम कर रहा है। इसके तहत 2030 के दशक तक छह स्वदेशी पनडुब्बियों की योजना है। एसएसबीएन के विपरीत, जिन्हें रणनीतिक प्रतिरोध के लिए तैयार किया गया है, एसएसएन दुश्मन की पनडुब्बियों का शिकार करने और नौसैनिक संपत्तियों की सुरक्षा के लिए तैयार की जाती हैं।

अधिकारियों ने कहा, "पनडुब्बी बेड़े का विस्तार भारत के परमाणु 'ट्रायड' के केंद्र में है और यह भारत को जमीन, हवा और समुद्र से परमाणु हथियार दागने की क्षमता प्रदान करेगा।" इनमें से समुद्र-आधारित हिस्से को सबसे सुरक्षित माना जाता है, जो पहले परमाणु हमले के बाद भी जवाबी कार्रवाई की क्षमता सुनिश्चित करता है।

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