कोलकाता , जुलाई 16 -- सिक्किम और कलिम्पोंग को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ने वाला राष्ट्रीय राजमार्ग-10 (एनएच-10), पूर्वी हिमालय में सबसे संवेदनशील पहाड़ी राजमार्गों में से एक बनता जा रहा है। मानसून के कारण बार-बार होने वाले भूस्खलन से इसके महत्वपूर्ण हिस्सों के बह जाने और संपर्क टूटने का खतरा पैदा हो गया है।
एक हालिया वैज्ञानिक अध्ययन ने चेतावनी दी है कि जब तक किसी वैकल्पिक सड़क गलियारे की पहचान नहीं की जाती और भूगर्भीय रूप से मजबूत इंजीनियरिंग तौर-तरीकों को नहीं अपनाया जाता, तब तक इस राजमार्ग को बार-बार ढहने की स्थिति का सामना करना पड़ेगा। इससे परिवहन, पर्यटन, सैन्य साजो-सामान की आपूर्ति और क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था खतरे में पड़ जाएगी।
एल्सेवियर जर्नल में प्रकाशित और भूगोलवेत्ता डॉ. बिस्वजीत बेरा द्वारा किए गए इस अध्ययन में एनएच-10 के साथ कई पुराने अस्थिर स्थानों की पहचान की गई है-जिनमें सेवक काली मंदिर, बीरिक, स्वेती झोरा, काली झोरा, गेल खोला, रवि खोला, 29वां मील, 20वां मील, भालू खोला, माम खोला और तारखोला शामिल हैं। ये स्थान भारी मानसून के दौरान तीस्ता नदी के कारण होने वाले भूस्खलन और तीव्र कटाव के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हैं।
अध्ययन के अनुसार, राजमार्ग की बढ़ती अस्थिरता अब केवल प्राकृतिक हिमालयी भूविज्ञान का परिणाम नहीं है। दक्षिण ल्होनक हिमनद झील के फटने से आई बाढ़ के बाद तीस्ता नदी के तल पर बड़े पैमाने पर गाद जमा होना, तीस्ता पर कई जलविद्युत बांधों का प्रभाव, एनएच-10 का विस्तार, भूगर्भीय रूप से नाजुक ढलानों के बीच सेवक-रंगपो रेलवे सुरंग का निर्माण, और कम अवधि की अत्यधिक भारी बारिश जैसे कारकों ने हाल के वर्षों में भूस्खलन की पुनरावृत्ति और तीव्रता दोनों को काफी बढ़ा दिया है।
सिद्धू कान्हो-बिरसा विश्वविद्यालय के भूगोल विभाग में सहायक प्रोफेसर डॉ. बेरा ने कहा, "एनएच-10 पर बार-बार होने वाला विनाश एक चेतावनी है कि पारंपरिक सड़क निर्माण प्रथाएं युवा और विवर्तनिक रूप से सक्रिय हिमालय के लिए अपर्याप्त हैं।"अध्ययन में उन्नत रिमोट सेंसिंग और भौगोलिक सूचना प्रणाली (जीआईएस) तकनीकों के उपयोग की सिफारिश की गई है, ताकि ढलानों के पुराने स्खलन का पता लगाया जा सके, जमीन में होने वाले बदलावों की निगरानी की जा सके और विनाशकारी भूस्खलन का रूप लेने से पहले सूक्ष्म दरारों की पहचान की जा सके। यह अध्ययन भ्रंश (फॉल्ट), मोड़ (फोल्ड) और चट्टानी सीमाओं की पहचान करने के लिए विस्तृत भूवैज्ञानिक मानचित्रण की भी वकालत करता है ताकि राजमार्गों को तुलनात्मक रूप से स्थिर भूभाग में बनाया जा सके।
डॉ. बेरा ने चट्टानों की मजबूती का सही आकलन करने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त रॉक मास रेटिंग (आरएमआर) और क्यू-सिस्टम जैसी तकनीकों का उपयोग करने की सलाह दी है। उनका कहना है कि इससे राजमार्गों और सुरंगों के लिए उपयुक्त संरचनात्मक सहारा तय करने में मदद मिलेगी। यह आकलन खास तौर पर न्यू ऑस्ट्रियन टनलिंग मेथड से बनने वाली सुरंग परियोजनाओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
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