नयी दिल्ली , सितंबर 03 -- केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन ने खतरा बढ़ने के दौरान संवेदनशील ग्लेशियल झीलों और हिमस्खलन संभावित क्षेत्रों की लगातार निगरानी को जरूरी बताते हुए राज्य एजेंसियों, जिला प्रशासन तथा वैज्ञानिक और तकनीकी संस्थानों के बीच करीबी समन्वय बनाए रखने पर जोर दिया है।
गृह मंत्रालय ने बताया कि श्री मोहन ने गुरुवार को यहां हिमालयी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (जीएलओएफ) और हिमस्खलन के जोखिम से निपटने की तैयारियों की समीक्षा के लिए बैठक की अध्यक्षता की।
बैठक में ग्लेशियल झीलों से अचानक आने वाली बाढ़ के उभरते जोखिमों की समीक्षा की गई। संवेदनशील ग्लेशियल झीलों और बर्फ से ढके क्षेत्रों की निगरानी, प्रारंभिक चेतावनी, अधिक जोखिम वाले स्थानों की पहचान, संभावित जल-प्रवाह मार्ग तय करने, चेतावनियों के समय पर प्रसार और निकासी व्यवस्था मजबूत करने पर जोर दिया गया।
राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने संवेदनशील झीलों की निगरानी, चेतावनी प्रणालियों, जल-प्रवाह मार्गों की योजना, सामुदायिक तैयारियों और संवेदनशील क्षेत्रों में प्रतिक्रिया संसाधनों की तैनाती से जुड़ी अपनी तैयारियों की जानकारी दी। बैठक में राज्य और केंद्र शासित प्रदेश के स्तर पर जोखिम और तैयारियों से जुड़े उपायों पर भी चर्चा हुई।
केंद्रीय गृह सचिव ने कहा कि जोखिम बढ़ने के दौरान संवेदनशील ग्लेशियल झीलों और हिमस्खलन संभावित क्षेत्रों की लगातार निगरानी जरूरी है। उन्होंने राज्य एजेंसियों, जिला प्रशासन तथा वैज्ञानिक और तकनीकी संस्थानों के बीच करीबी समन्वय बनाए रखने पर जोर दिया, ताकि चेतावनियों पर तुरंत कार्रवाई हो सके।
उन्होंने कहा कि जीएलओएफ और हिमस्खलन से निपटने की तैयारियां केवल घटना के बाद की कार्रवाई तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि जोखिम के आधार पर योजना, रोकथाम के उपाय और सामुदायिक तैयारियों पर भी जोर दिया जाना चाहिए। राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को अपनी तैयारियों की नियमित समीक्षा करने तथा चेतावनी और निकासी व्यवस्था की कमियों को समय रहते दूर करने की सलाह दी गयी। साथ ही, वर्ष 2024 में केंद्र सरकार द्वारा स्वीकृत जीएलओएफ शमन परियोजना के क्रियान्वयन में तेजी लाने को कहा गया।
बैठक में अंतर-एजेंसी समन्वय बनाए रखने, जोखिम संबंधी सूचनाओं के नियमित आदान-प्रदान तथा प्रारंभिक चेतावनी और कार्रवाई तंत्र को और मजबूत करने पर जोर दिया गया, ताकि संवेदनशील हिमालयी क्षेत्रों में जनहानि और संपत्ति के नुकसान को कम से कम किया जा सके।
बैठक में उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के मुख्य सचिवों तथा राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरणों के प्रतिनिधियों के अलावा गृह मंत्रालय, राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण, केंद्रीय जल आयोग, भारत मौसम विज्ञान विभाग और रक्षा भू-सूचना विज्ञान अनुसंधान प्रतिष्ठान के वरिष्ठ अधिकारियों ने हिस्सा लिया।
हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित