देहरादून , मई 19 -- उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता भुवन चंद्र खंडूरी का मंगलवार को पूर्वाह्न 11 बजकर 10 मिनट पर निधन हो गया। वह 91 वर्ष के थे और लंबे समय से वृद्धावस्था जनित रोगों से ग्रस्त थे। श्री खंडूरी का बुधवार को पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंत्येष्टि की जायेगी।
श्री खंडूरी का देहरादून स्थित मैक्स हॉस्पिटल में उपचार किया जा रहा था, जहां उन्होंने आज अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर से पूरे प्रदेश में शोक की लहर है।
राज्य सरकार ने श्री खंडूरी के निधन पर तीन दिन का राजकीय शोक घोषित किया है। कल होने वाली उनके अंतिम संस्कार पर राज्य में सार्वजनिक अवकाश घोषित किया गया है।
राज्य गठन के बाद श्री खंडूरी ने चौथे मुख्यमंत्री के रूप में सेवा दी थी। उसके बाद दुबारा उन्हें छठे मुख्यमंत्री के रूप में जनता की सेवा करने का अवसर मिला। वर्ष 1990 में वह सेना की इंजीनियर कोर से मेजर जनरल के पद से सेवानिवृत्त हुए। इसके बाद उन्हें भाजपा के दिग्गज नेता पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई ने लोकसभा का टिकट पौड़ी गढ़वाल क्षेत्र से दिया। केंद्र में श्री वाजपेई के प्रधानमंत्रित्व वाली सरकार में उन्हें राज्यमंत्री का दायित्व भी दिया गया। वह अत्यन्त कड़क मिजाज और ईमानदार नेताओं में शुमार थे।
श्री खंडूरी का जन्म एक अक्टूबर 1934 को हुआ था । उन्होंने 1954 से 1991 तक भारतीय सेना की 'इंजीनियर्स कोर' में एक शानदार करियर के रूप में अपनी सेवाएं दीं और मेजर जनरल के पद से सेवानिवृत्त हुए। सेना में उनकी विशिष्ट सेवाओं के लिए उन्हें 'अति विशिष्ट सेवा मेडल' से सम्मानित किया गया था।
मेजर जनरल (सेवानिवृत्त) खण्डूरी सेना में रहते हुए देश के लिए तीन जंग लड़े और अपने उत्कृष्ट योगदान के लिए अति विशिष्ट सेवा मेडल से सम्मानित हुए। सेना से मेजर जनरल के पद पर सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने सार्वजनिक जीवन में प्रवेश किया और गढ़वाल से कई बार सांसद चुने गए। वह केन्द्र सरकार में सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री रहे तथा उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के रूप में दो कार्यकालों में सेवा दी। उनका राजनीतिक जीवन सादगी, पारदर्शिता और सुशासन के लिए विशेष रूप से जाना जाता है। उन्होंने गोल्डन क्वाड्रिलेटरल एवं राष्ट्रीय राजमार्ग विकास परियोजना को गति देकर देश की सड़क संपर्क व्यवस्था को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
श्री खंडूरी ने उत्तराखंड में मजबूत लोकायुक्त व्यवस्था और भ्रष्टाचार विरोधी पहल को आगे बढ़ाया। मुख्यमंत्री रहते हुए प्रशासनिक सादगी, पारदर्शिता और जनकेंद्रित शासन को प्राथमिकता दी। सैनिक अनुशासन और राष्ट्रहित को सार्वजनिक जीवन में उतारने वाले नेतृत्वकर्ता के रूप में पहचान बनाई। उनका जीवन सेना से राजनीति तक राष्ट्र और समाज की निस्वार्थ सेवा को समर्पित रहा। उनका निधन उत्तराखंड और देश के लिए एक अपूरणीय क्षति है।
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