लखनऊ , जुलाई 31 -- संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई) के अस्थिरोग विभाग के चिकित्सकों ने हाल ही में हृदय की धमनियों में स्टेंट लगवाने वाले एक बुजुर्ग मरीज के अत्यंत जटिल हिप फ्रैक्चर का सफल ऑपरेशन कर चिकित्सा क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल की है।
संस्थान के अनुसार मरीज को दो माह पूर्व गंभीर हृदयाघात के बाद हृदय की धमनियों में दो ड्रग-एल्यूटिंग स्टेंट लगाए गए थे और वह ड्यूल एंटीप्लेटलेट थेरेपी (डीएपीटी) पर थे। ऐसी स्थिति में सर्जरी करना चिकित्सकों के लिए बड़ी चुनौती थी, क्योंकि एक ओर अत्यधिक रक्तस्राव का जोखिम था, वहीं दूसरी ओर दवाएं बंद करने पर स्टेंट में रक्त का थक्का बनने का जानलेवा खतरा भी बना हुआ था।
विशेषज्ञों ने बताया कि बुजुर्गों में हिप फ्रैक्चर एक ऑर्थोपेडिक आपातकाल माना जाता है। ऑपरेशन में देरी होने पर निमोनिया, डीप वेन थ्रॉम्बोसिस, बेड सोर्स, लंबे समय तक बिस्तर पर रहने और मृत्यु का खतरा बढ़ जाता है। वहीं हाल ही में स्टेंट लगवाने वाले मरीजों की बड़ी सर्जरी आधुनिक चिकित्सा की सबसे जटिल परिस्थितियों में से एक मानी जाती है।
मरीज की अधिक आयु और अन्य गंभीर बीमारियों को देखते हुए ऑर्थोपेडिक्स, कार्डियोलॉजी तथा एनेस्थीसियोलॉजी विभागों के विशेषज्ञों ने संयुक्त रूप से उपचार योजना तैयार की। पूर्व नियोजित रणनीति के तहत अल्ट्रासाउंड-गाइडेड कंटीन्यूअस स्पाइनल एनेस्थीसिया दिया गया, जिससे ऑपरेशन के दौरान मरीज की हृदय संबंधी स्थिति स्थिर बनी रही और सर्जरी सफलतापूर्वक संपन्न हुई।
इस ऑपरेशन का नेतृत्व अस्थिरोग विभाग के अतिरिक्त प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष डॉ. पुलक शर्मा ने किया, जबकि एनेस्थीसिया टीम का नेतृत्व डॉ. वंशप्रिया ने किया। ऑर्थोपेडिक टीम में डॉ. फुरकान, डॉ. सुजीत, डॉ. अभिषेक और डॉ. विकास भी शामिल रहे।
संस्थान के अनुसार ऑपरेशन के तीन सप्ताह बाद मरीज स्वस्थ होने की दिशा में तेजी से अग्रसर हैं। उन्होंने सहारे के साथ चलना शुरू कर दिया है और दैनिक जीवन के अधिकांश कार्य स्वयं करने लगे हैं। चिकित्सकों ने इसे समय पर सर्जरी, सुनियोजित उपचार और विभिन्न विभागों के समन्वित प्रयासों का परिणाम बताया।
उपचार करने वाली टीम ने एसजीपीजीआई के निदेशक प्रो. (डॉ.) आर.के. धीमन के प्रशासनिक सहयोग और संस्थान में उपलब्ध अत्याधुनिक चिकित्सा सुविधाओं की सराहना करते हुए कहा कि इसी बहुविषयक चिकित्सा व्यवस्था के कारण ऐसे अत्यधिक जोखिम वाले मरीज का सफल उपचार संभव हो सका। चिकित्सकों ने कहा कि इस प्रकार की जटिल सर्जरी केवल अत्याधुनिक सुविधाओं और बहुविषयक विशेषज्ञता से युक्त तृतीयक चिकित्सा संस्थानों में ही की जानी चाहिए।
हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित