नयी दिल्ली, मई 25 -- विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के एक स्वायत्त संस्थान, बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ पैलियोसाइंसेज (बीएसआईपी) के शोधकर्ताओं ने प्राचीन गोंडवाना के जंगलों में लगभग 25 करोड़ साल पहले फैली भीषण आग के साक्ष्याें के लिये उन्नत आणविक विधियों का उपयोग किया है। इस आग ने पृथ्वी की जलवायु, वनस्पति और कोयला निर्माण के वातावरण को आकार दिया था।
भारतीय पर्मियन तलछटों में वृहद चारकोल आधारित प्राचीन अग्नि अध्ययन ने व्यापक स्तर पर प्राचीन अग्नि कार्यकलाप के पहले ठोस प्रमाण प्रदान किए थे। इन परिणामों के आधार पर, शोधकर्ताओं ने पर्मियन तलछटी अनुक्रमों के भीतर सूक्ष्म चारकोल कणों के विभिन्न रूपों के बीच अंतर करना आरंभ किया, जिससे अधिक विस्तृत, उच्च-रिज़ॉल्यूशन अग्नि पुनर्निर्माण की संभावना उजागर हुई।
पहले यह देखा गया था कि पुरातात्विक अग्नि संबंधी शोध में प्रयुक्त आणविक विधियों, विशेष रूप से सूक्ष्म चारकोल कणों के विभिन्न रूपों, विशेषकर ओएक्स-सीएच (ऑक्सीकृत अपारदर्शी फाइटोक्लास्ट) और पीएएल-सीएच (अग्नि-प्रेरित अपारदर्शी फाइटोक्लास्ट) के बीच अंतर करने की कमी एक बड़ी चुनौती थी। पूर्व के अध्ययनों में अधिकतर सूक्ष्मदर्शी अवलोकन पर निर्भरता थी, जो जानकारीपूर्ण होने के बावजूद, चारकोल कणों की उत्पत्ति और प्रकृति की व्याख्या में बहुत अस्पष्टता पैदा करती थी।
बीएसआईपी के शोधकर्ताओं ने इस कमी को भांपते हुए एक नवीन मल्टी-प्रॉक्सी दृष्टिकोण का उपयोग किया। इसमें पैलिनोफेसिस विश्लेषण (तलछटी चट्टानों में संरक्षित सूक्ष्म कार्बनिक पदार्थों का अध्ययन) नामक तकनीक को रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी और फूरियर ट्रांसफॉर्म इन्फ्रारेड (एफटीआईआर) स्पेक्ट्रोस्कोपी जैसी उन्नत आणविक विधियों के साथ एकीकृत किया गया, ताकि भारत के गोदावरी घाटी कोयला क्षेत्र के गोंडवाना कोयला-युक्त तलछटों से पर्मियन काल की प्राचीन अग्नि घटनाओं का पुनर्निर्माण किया जा सके।
जियोलॉजिकल जर्नल (विली) में प्रकाशित यह शोधपत्र गोंडवाना बेसिन के पुरापर्यावरण का पुनर्निर्माण करके दीर्घकालिक जलवायु परिवर्तन के अधिक सटीक मॉडल बनाने में मदद कर सकता है। इसके साथ ही, यह पर्यावरण में भविष्य के परिवर्तनों और इको-सिस्टम, खासकर पुरा वन की आग जैसी चरम घटनाओं के संदर्भ में व्यवहार का पूर्वानुमान लगाने में महत्वपूर्ण हो सकता है, जो बदलती जलवायु में अधिक प्रासंगिक होती जा रही हैं।
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