बेंगलुरु , मई 07 -- कर्नाटक में बेंगलुरु के एक कॉलेज में डोनर अभियान में अपना पंजीकरण कराने वाले व्यक्ति ने थैलेसीमिया से जूझ रही 12 साल की एक बच्ची की जान बचा दी।

विश्व थैलेसीमिया दिवस से पहले, डीकेएमएस फ़ाउंडेशन इंडिया ने कर्नाटक के कोलार के रहने वाले आईटी पेशेवर दिलीप के (27) को समीक्षा से मिलवाया। समीक्षा वही बच्ची है जिसकी जान बचाने में दिलीप ने स्टेम सेल दान के ज़रिए मदद की थी - यह मुलाक़ात भावनाओं, कृतज्ञता और उम्मीद से भरी थी।

इस मुलाक़ात के साथ ही डीकेएमएस फाउंडेशन इंडिया की एक नयी पहल की भी शुरुआत हुई, जिसके तहत पूरे भारत में ट्रांसफ़्यूज़न पर निर्भर थैलेसीमिया से पीड़ित 12 साल से कम उम्र के सभी बच्चों के लिए मुफ़्त एचएलए टाइपिंग की सुविधा दी जाएगी।

दिलीप ने सालों पहले कॉलेज में चले एक जागरूकता अभियान के दौरान संभावित स्टेम सेल डोनर के तौर पर अपना नाम लिखवाया था। उसने कभी सोचा भी नहीं था कि एक आम से अभियान के दौरान उसके गाल से लिया गया एक छोटा सा सैंपल एक दिन उसे उस बच्ची से जोड़ देगा जो ज़िंदगी का दूसरा मौक़ा मिलने का इंतज़ार कर रही थी।

दिलीप ने समीक्षा से पहली बार मिलने के बाद कहा, "जब मैंने अपना नाम लिखवाया था, तब मैंने इसके बारे में ज़्यादा नहीं सोचा था। अब तक, वह मेरे लिए सिर्फ़ कागज़ों पर एक 'मैच' थी। आज उससे मिलकर सब कुछ असल लगने लगा है।"समीक्षा के परिवार के लिए यह सफ़र सालों की अनिश्चितता, अस्पताल के चक्कर लगाने और नियमित ब्लड ट्रांसफ़्यूज़न पर निर्भर रहने वाला रहा। उसे बहुत कम उम्र में ही 'बीटा थैलेसीमिया मेजर' होने का पता चला था।

डॉक्टरों ने बताया कि स्टेम सेल ट्रांसप्लांट ही उसके ठीक होने का एकमात्र ज़रिया था, लेकिन किसी ऐसे डोनर को ढूँढ़ना जो उससे जुड़ा हुआ न हो और जिसका मैच उससे पूरी तरह मिलता हो, सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक था।

ब्लडकेयर हेमेटोलॉजी क्लिनिक और डायग्नोस्टिक सेंटर के सलाहकार हेमेटोलॉजिस्ट और स्टेम सेल ट्रांसप्लांट फ़िज़िशियन डॉ. सिद्धेश कालंत्री ने कहा, "जब समीक्षा पहली बार हमारे पास आई थी, तब वह महज़ कुछ महीनों की थी। वह इतनी छोटी थी कि यह समझ भी नहीं सकती थी कि आगे क्या होने वाला है, फिर भी उसमें ज़िंदगी जीने का एक ऐसा जज़्बा था जो उसकी देखभाल करने वाले हर इंसान को साफ़ दिखाई देता था।"समीक्षा के पिता ने उस तकलीफ़देह अनिश्चितता को याद किया जिसका सामना उनके परिवार को डोनर की तलाश के दौरान करना पड़ा था। उन्होंने कहा "हमने सालों तक एक डोनर का इंतज़ार किया और उम्मीद लगाए रखी। कई बार ऐसा लगा कि शायद यह मुमकिन न हो, लेकिन हमने कभी हार नहीं मानी। आज उनसे मिलना, कुछ ऐसा है जिसकी हमने सिर्फ़ कल्पना ही की थी।"ट्रांसप्लांट के बाद अब ठीक हो रही समीक्षा कहती है कि आखिरकार वह एक सामान्य बचपन जी पा रही है। समीक्षा ने मुस्कुराते हुए कहा "अब मैं खुश महसूस करती हूँ। मैं दूसरे बच्चों की तरह खेल सकती हूँ और स्कूल जा सकती हूँ।"खून से जुड़ी बीमारियों से जूझ रहे कई परिवारों पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ को समझते हुए, संस्थान ने कहा कि उसने अपने 'पेशेंट फंडिंग प्रोग्राम' के ज़रिए समीक्षा के इलाज में भी मदद की है। यह कार्यक्रम आर्थिक रूप से कमज़ोर पृष्ठभूमि वाले मरीज़ों को स्टेम सेल ट्रांसप्लांट के लिए कुछ आर्थिक सहायता देता है।

डीकेएमएस के मुताबिक, भारत में हर साल 10,000 से ज़्यादा बच्चे थैलेसीमिया के साथ पैदा होते हैं। जहाँ कई मामलों में ज़िंदगी बचाने के लिए नियमित रूप से खून चढ़ाना ज़रूरी होता है, वहीं अक्सर स्टेम सेल ट्रांसप्लांटेशन ही एकमात्र इलाज होता है। हालाँकि, परिवार से बाहर के ऐसे डोनर मिलना, जिनका ब्लड ग्रुप वगैरह मैच करता हो, काफ़ी मुश्किल होता है, खासकर भारतीय आबादी में।

उन्होंने कहा कि संभावित स्टेम सेल डोनर के तौर पर रजिस्टर करने के लिए व्यक्ति का स्वस्थ वयस्क होना और उसकी उम्र 18 से 55 साल के बीच होना ज़रूरी है। रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया में एक सहमति फ़ॉर्म भरना और एचएलए जाँच के लिए गाल के अंदर से सैंपल देना शामिल है; इसके बाद व्यक्ति का नाम अंतरराष्ट्रीय डोनर रजिस्ट्री प्लेटफ़ॉर्म पर बिना पहचान ज़ाहिर किए दर्ज कर लिया जाता है।

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