सिलीगुड़ी , मार्च 10 -- केरल सरकार के एक अप्रैल से बागान श्रमिकों की दैनिक मजदूरी बढ़ाकर 546 रुपये करने के हालिया फैसले ने उत्तर बंगाल के चाय बागानों में कम मजदूरी के मुद्दे को फिर चर्चा में ला दिया है और श्रमिक संगठन अब इस क्षेत्र में भी वैधानिक न्यूनतम मजदूरी को तत्काल लागू करने की मांग कर रहे हैं।
विधानसभा चुनावों से पहले, उत्तर बंगाल के चाय बागान श्रमिकों ने नौ और 10 मार्च को कई बागानों के मुख्य द्वारों पर प्रदर्शन किया। इस दौरान उन्होंने मजदूरी, रोजगार सुरक्षा और कल्याणकारी लाभों से जुड़ी पुरानी मांगों को उठाया। ये विरोध प्रदर्शन केंद्र-राज्य सरकारों के सामने रखी गयी दस सूत्री मांग पत्र के आधार पर किये गये हैं।
चाय बागान श्रमिकों का कहना है कि न्यूनतम मजदूरी का मामला सिर्फ पश्चिम बंगाल में ही नहीं है, बल्कि असम और त्रिपुरा जैसे चाय बागान वाले राज्यों में भी इसकी न्यूनतम मजदूरी बेहद कम है।
केरल के इस घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए चिया बागान मजदूर यूनियन (सीबीएमयू) महासचिव और चाय श्रमिक संगठनों के संयुक्त फोरम के प्रतिनिधि जियाउल आलम ने कहा कि यह वेतन संशोधन पूर्वी भारत के चाय श्रमिकों के साथ हो रहे भारी भेदभाव को दर्शाता है। उन्होंने बताया कि प्रतिदिन 48 रुपये की बढ़ोतरी के साथ अब केरल के रबर, चाय, कॉफी और इलायची क्षेत्रों में बागान श्रमिकों की न्यूनतम मजदूरी 546 रुपये हो जायेगी।
श्री आलम ने कहा कि यह कदम न्यूनतम मजदूरी अधिनियम 1948 को लागू करने के प्रति राज्य की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। उन्होंने आरोप लगाया कि पश्चिम बंगाल, असम और त्रिपुरा जैसे बागान राज्यों ने अभी तक वैधानिक न्यूनतम मजदूरी लागू नहीं की है। इससे श्रमिक 220 से 258 रुपये के बीच की दैनिक मजदूरी पर गुजर-बसर करने को मजबूर हैं।
उत्तर बंगाल में प्रदर्शनों में उठायी गयी प्रमुख मांग चाय उद्योग में वैधानिक न्यूनतम मजदूरी तत्काल लागू करना है। श्रमिक प्रतिनिधियों ने आरोप लगाया कि 20 फरवरी 2015 को हुए त्रिपक्षीय समझौते के बावजूद पश्चिम बंगाल के लाखों चाय श्रमिकों को अब भी प्रतिदिन केवल 250 रुपये के करीब मिल रहे हैं। यह देश में अनुसूचित रोजगारों के बीच सबसे कम मजदूरी दरों में से एक है। उन्होंने कहा कि दिसंबर 2021 में मदारीहाट में हुई न्यूनतम मजदूरी सलाहकार समिति की अंतिम बैठक में सरकारी लागत सूचकांकों के आधार पर श्रमिक प्रतिनिधियों ने प्रतिदिन 660 रुपये की न्यूनतम मजदूरी का प्रस्ताव रखा था।
प्रदर्शनकारियों ने कर्मचारियों के मासिक वेतन ढांचे में तत्काल संशोधन की भी मांग की है। उनका दावा है कि पिछला समझौता 31 मार्च 2023 को समाप्त होने के बाद से यह लंबित है। उन्होंने आगे आरोप लगाया कि ' अतिरिक्त पत्ती प्रोत्साहन राशि ' (ईएलपी) और 'अतिरिक्त क्षतिपूर्ति वेतन' (एसीपी) जैसे वेतन के प्रमुख घटकों में 2017 से कोई संशोधन नहीं किया गया है, जिससे श्रमिकों की दैनिक कमाई कम हो गयी है। अन्य मांगों में मजदूरी से अवैध कटौती रोकना, मातृत्व और बीमारी अवकाश के लाभों से वंचित करना बंद करना, अस्थायी श्रमिकों को नियमित करना और समान कार्य के लिए समान वेतन देना शामिल है। श्रमिकों ने बिजली से चलने वाली मशीनों को चलाने वाले कर्मचारियों के लिए उच्च मजदूरी, उचित प्रशिक्षण, सुरक्षा उपकरण और स्पष्ट कार्य मानदंडों की भी मांग की।
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