तिरुवनंतपुरम , अगस्त 15 -- केरल के मुख्यमंत्री वीडी सतीशन की मौजूदगी में सेंट्रल स्टेडियम में शनिवार को स्वतंत्रता दिवस समारोह में 'वंदे मातरम' नहीं बल्कि राष्ट्रगान ही गाया गया।
उन्होंने इस अवसर पर देश के ऐसे हालात का जिक्र किया जब संवैधानिक मूल्यों, धर्मनिरपेक्षता, बराबरी, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों एवं अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों के अधिकारों पर लगातार हमले बढ़ रहे हैं।
श्री सतीशन ने पहले कहा था कि राज्य सरकार और सत्ताधारी संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (यूडीएफ) का इस मुद्दे पर स्पष्ट रुख है और स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान उनका रुख साफ हो जाएगा। यह विवाद मुख्य सचिव द्वारा जारी एक सर्कुलर के बाद शुरू हुआ, जिसमें 'हर घर तिरंगा' अभियान के तहत 'वंदे मातरम्' का पूरा संस्करण गाने का निर्देश दिया गया था।
मुख्यमंत्री ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के साथ जाति-आधारित भेदभाव का परोक्ष रूप से जिक्र करते हुए अपने स्वतंत्रता दिवस संबोधन में जाति-आधारित भेदभाव की कड़ी निंदा की। उन्होंने ऐसी घटनाओं को बेहद अफसोसजनक बताया और कहा कि इनका विरोध किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि देश ऐसे दौर से गुजर रहा है जब संवैधानिक मूल्यों, धर्मनिरपेक्षता, समानता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों तथा अनुसूचित जातियों और जनजातियों के अधिकारों पर सवाल उठाए जा रहे हैं।
उन्होंने कहा कि संविधान, देश की एकता और अखंडता तथा धर्मनिरपेक्षता की रक्षा के लिए सभी को बिना किसी समझौते के एकजुट होना चाहिए।
श्री सतीशन ने श्री खरगे से जुड़ी हालिया घटना का जिक्र करते हुए कहा कि यह विशेष रूप से चिंताजनक है कि एक वरिष्ठ राष्ट्रीय नेता, जिन्होंने महत्वपूर्ण संवैधानिक पदों पर काम किया है, उन्हें जाति के आधार पर अपमान का सामना करना पड़ा। उन्होंने जातिगत भेदभाव और छुआछूत की वापसी के खिलाफ चेतावनी दी।
मुख्यमंत्री ने कहा कि महात्मा गांधी, डॉ. बीआर आंबेडकर और जवाहरलाल नेहरू द्वारा बताए गए आदर्श मौजूदा हालात में भी बेहद प्रासंगिक हैं। उन्होंने देशभर के युवाओं द्वारा जताई गई चिंताओं का भी जिक्र किया और कहा कि उन्हें नजरंदाज नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि युवाओं में राजनीतिक जागरूकता है और उनमें सुधार लाने वाली ताकत के रूप में काम करने तथा भविष्य में स्पष्टता के साथ देश का नेतृत्व करने की क्षमता है।श्री सतीशन ने कहा कि भारत की आजादी को केवल राजनीतिक स्वतंत्रता के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। सच्ची आजादी का मतलब गरीबी, अशिक्षा, असमानता और सामाजिक भेदभाव से मुक्ति भी होना चाहिए।
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