तिरुवनंतपुरम , जनवरी 11 -- केरल विधानसभा के अध्यक्ष ए. एन. शमसीर ने कहा है कि पिछले एक दशक के दौरान केरल में हाशिए पर रहने वाले सामाजिक समूहों की ओर से किसी बड़े संघर्ष का न होना, राज्य के विकास का प्रतीक माना जाना चाहिए।

श्री शमसीर ने केरल विधानसभा के चौथे अंतर्राष्ट्रीय पुस्तक उत्सव के दौरान डॉ. के. रविरामन की पुस्तक 'पॉलिटिकल इकोस्पेशियलिटी: लाइवलीहुड, एनवायरनमेंट एंड सबाल्टर्न स्ट्रगल्स' पर चर्चा के दौरान यह बात कही। यह पुस्तक कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस द्वारा प्रकाशित की गई है।

अध्यक्ष ने इस बात पर जोर दिया कि पिछले दस वर्षों में आदिवासी और दलितों सहित हाशिए के समुदायों की ओर से विरोध प्रदर्शनों या आंदोलनों की कमी को गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों सहित विभिन्न विकास पहलों के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा, "यह अवधि केरल के विकास मॉडल को दर्शाती है, जो समाज के पिछड़े वर्गों को साथ लेकर और उन्हें मुख्यधारा में जोड़कर आगे बढ़ा है।"चर्चा के दौरान डॉ. सुजा सुसान जॉर्ज ने कहा कि जहाँ केरल में कई प्रगतिशील पहल मार्क्सवादी नेतृत्व वाली सरकारों द्वारा शुरू की गईं, हालांकि बाद में जब कुछ नीतियों के प्रतिकूल परिणाम सामने आए, तो राज्य में श्रम और पर्यावरण संबंधी संघर्ष भी देखे गए। उन्होंने पुस्तक में बताए गए 'चलियार' और 'प्लाचीमडा' संघर्षों को इसका उदाहरण बताया।

पैनल की एक अन्य सदस्य डॉ. माया प्रमोद ने पुस्तक में दर्ज सभी संघर्षों में महिलाओं, विशेषकर दलित महिलाओं की महत्वपूर्ण भागीदारी को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि ऐसे आंदोलनों ने केरल में निर्णायक सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन लाने में बड़ी भूमिका निभाई है।

अर्थशास्त्री एवं राज्य योजना बोर्ड के सदस्य डॉ. के. रविरामन ने बताया कि यह पुस्तक लगभग 20 वर्षों के शोध का परिणाम है। इसमें 1970 के दशक से कई संघर्षों में शामिल होने के उनके व्यक्तिगत अनुभव और ब्रिटिश लाइब्रेरी व नेहरू मेमोरियल जैसे संस्थानों के व्यापक शोध शामिल हैं।

यह पुस्तक मावूर (कोझिकोड), मुथंगा (वायनाड), चेंगारा (पतनमथिट्टा), प्लाचीमडा (पालक्काड), एंडोसल्फान संघर्ष (कासरगोड) और पेम्पिलाई ओरुमई (मुन्नार, इडुक्की) जैसे केरल के छह ऐतिहासिक संघर्षों पर विस्तार से चर्चा करती है।

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