तिरुवनंतपुरम , अगस्त 29 -- केरल की लोक और पारंपरिक कलाओं की समृद्ध विरासत को 'ओणम पर्यटन सप्ताह' के जश्न के ज़रिए नयी पहचान मिल रही है वहीं पर्यटन विभाग पारंपरिक कलाकारों और उनकी विविध सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के लिए एक अहम मंच उपलब्ध करा रहा है।

पर्यटन मंत्री पी.सी. विष्णुनाथ की योजना के अनुसार 24 से 30 अगस्त तक चलने वाले इस सप्ताह भर के जश्न के तहत मुख्य स्थल 'निशागांधी' में हर दिन एक पारंपरिक कला का प्रदर्शन किया जा रहा है। इन आयोजनों में थोल्पावाकूथु, पडयानी, अर्जुन नृथम, पूथानम थिरायुम, थेय्यम, ओट्टम थुल्लल, सर्प्पाप्पट्टू, डफमुट्ट, मुडियेट्टू और ओप्पाना जैसी पारंपरिक कलाओं को पेश किया जा रहा है।

श्री विष्णुनाथ ने कहा, "हमें राज्य के हर ज़िले में कम से कम दो या तीन अलग-अलग पारंपरिक कला रूप देखने को मिल सकते हैं।" उन्होंने बताया कि इनमें से हर कला रूप केरल की पौराणिक कथाओं, इतिहास और संस्कृति से जुड़ी कहानियों को समेटे हुए है। उन्होंने कहा, "ये कला रूप पारंपरिक संगीत, कला, वेशभूषा और प्रदर्शन का मिश्रण हैं, जो इतिहास और परंपराओं से गहराई से जुड़े हुए हैं।"मंत्री ने कहा कि पर्यटन और संस्कृति विभाग राज्य में सांस्कृतिक पर्यटन को बढ़ावा देने की कोशिशों के तहत इन पारंपरिक कलाओं को फिर से जीवित करने और उनकी विविध कलात्मक अभिव्यक्तियों को बड़े वैश्विक दर्शकों के सामने पेश करने के लिए उत्सुक हैं।

पद्म श्री पुरस्कार विजेता और प्रसिद्ध थोलपावाकूथु कलाकार रामचंद्र पुलावर ने त्योहार के दौरान पारंपरिक कलाओं को अधिक महत्व देने के फैसले का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि इन कलाओं को उनके पारंपरिक परिवेश से बाहर ले जाने और नए दर्शकों से परिचित कराने के लिए बड़े मंचों की आवश्यकता है।

निशागांधी में मावेली चरित्रम थोलपावाकूथु प्रस्तुति का नेतृत्व करने वाले पुलावर ने कहा, "पारंपरिक कलाओं को ऐसे मंचों की आवश्यकता है जो अधिक लोगों तक पहुंच सकें।" उन्होंने कलाकारों द्वारा अपनी कला को समकालीन संदर्भों के अनुकूल बनाने, नये विषयों की खोज करने और नये दर्शकों तक पहुंचने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।

पुलावर के अनुसार, पारंपरिक कलाओं को केरल के बाहर के दर्शकों तक ले जाने में भाषा अब कोई बड़ी बाधा नहीं होनी चाहिए, क्योंकि गूगल ट्रांसलेट और चैटजीपीटी जैसे डिजिटल अनुवाद उपकरण पारंपरिक कहानियों, तकनीकों और मुद्राओं को विभिन्न भाषाओं में समझाने में मदद कर सकते हैं। उन्होंने महाबली, ईसा मसीह और केरल की उत्पत्ति की कहानियों सहित विविध आख्यानों के साथ अपने प्रयोगों का उदाहरण देते हुए बताया कि कैसे पारंपरिक कलाओं को व्यापक दर्शकों के लिए प्रासंगिक बनाए रखने के लिए अनुकूलित किया जा सकता है।

पुलावर ने प्रसिद्ध फिल्म निर्माता जी. अरविंदन के उनके घर आने को भी याद किया और कहा कि वहां देखी गई देवी गंगालक्ष्मी की कठपुतली ने फिल्म निर्माता को अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव केरल का प्रतिष्ठित लोगो बनाने के लिए प्रेरित किया। पलक्कड़-मलप्पुरम क्षेत्र में उत्पन्न पारंपरिक लोक कला 'पूथानू थिरा' के कलाकार के.एम. उन्नी कृष्णन ने कहा कि केरल की स्वदेशी कलाओं का गहरा सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व है और उन्हें संरक्षित करने की आवश्यकता है।

उन्नी कृष्णन (72) ने आठ साल की उम्र में यह कला सीखना शुरू किया था और अब 'रमन स्मारक थिरा पूथना संगम' चलाते हैं। उन्होंने कहा कि ओणम जैसे उत्सव इन परंपराओं को बचाने और उन पर निर्भर समुदायों को बनाए रखने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

प्रसिद्ध पडयानी कलाकार बी. सुरेश कुमार ने कहा कि पडयानी के एक कार्यक्रम से कलाकार समुदाय के लगभग 20 सदस्यों को सीधा फ़ायदा हो सकता है। उन्होंने कहा, "हमारी सभी पारंपरिक कला शैलियाँ उन कलाकारों की देन हैं जो अनोखे ढंग से कुशल हैं। जब सरकार हमें ओणम जैसे त्योहारों के ज़रिए मंच देती है, तो ये कलाकार अपना गुज़ारा कर सकते हैं।" उन्होंने पारंपरिक कला शैलियों के लिए एक अलग त्योहार आयोजित करने का भी सुझाव दिया और कहा कि इससे केरल में पर्यटन को और बढ़ावा मिल सकता है। उन्होंने नयी संभावनाओं को तलाशने और इन कला शैलियों को ज़्यादा दायरा और पहचान दिलाने के तरीके खोजने के लिए, अलग-अलग पारंपरिक कला शैलियों के कलाकारों को संस्कृति मंत्रालय के तहत एक साथ लाने का प्रस्ताव रखा।

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