तिरुवनंतपुरम , दिसंबर 21 -- केरल के वर्कला में 'स्वदेश दर्शन 2.0-दक्षिण काशी परियोजना' के संबंध में कानून के उल्लंघन, प्रशासनिक लापरवाही तथा सार्वजनिक धन के दुरुपयोग के गंभीर आरोप सामने आये हैं।
'एनवायरनमेंटल प्रोटेक्शन एंड रिसर्च काउंसिल' (ईपीआरसी) के अध्यक्ष संजीव एस. जे. ने पर्यटन निदेशालय को सौंपे गए एक विस्तृत प्रतिवेदन में वरिष्ठ अधिकारियों पर आरोप लगाया है कि उन्होंने प्राचीन और पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील श्री जनार्दनस्वामी मंदिर परिसर के भीतर अनधिकृत निर्माण गतिविधियों को जारी रखने में मदद की, जबकि वर्कला नगरपालिका द्वारा काम रोकने का आदेश (स्टॉप मेमो) जारी किया गया था।
गौरतलब है कि 25 सितंबर, 2025 को जारी किए गए इस स्टॉप मेमो में केरल नगरपालिका अधिनियम और केरल नगरपालिका भवन नियमों के उल्लंघन का हवाला देते हुए मंदिर स्थल पर अनधिकृत कार्यों को तत्काल रोकने का निर्देश दिया गया था।
ईपीआरसी के अनुसार, 26 सितंबर, 2025 को अतिरिक्त महानिदेशक (पर्यटन) (एडीजी) की अध्यक्षता में दक्षिण काशी परियोजना पर स्टॉप मेमो के प्रभावों पर चर्चा करने के लिए बैठक बुलाई गई थी।
बताया जाता है कि उस बैठक में यह आश्वासन दिया गया था कि केवल मामूली सफाई गतिविधियां ही की जाएंगी और वैध परमिट के बिना कोई निर्माण कार्य आगे नहीं बढ़ेगा, लेकिन बाद के निरीक्षणों में वहां मिट्टी की कटाई और निर्माण कार्य जारी पाया गया। कथित तौर पर ये गतिविधियां स्टॉप मेमो और नगरपालिका अधिकारियों को दिये गये आश्वासनों का उल्लंघन करके की गईं।
इन उल्लंघनों के कारण वर्कला नगरपालिका के सचिव को 2 दिसंबर, 2025 को नगरपालिका अधिनियम और भवन नियमों के प्रासंगिक प्रावधानों का हवाला देते हुए स्टॉप मेमो को फिर से लागू करना पड़ा। फिर से लागू किए गए इस आदेश में विशेष रूप से 26 सितंबर की बैठक का उल्लेख किया गया और यह रेखांकित किया गया कि वहां दिए गए आश्वासनों का सम्मान नहीं किया गया।
ईपीआरसी ने आगे आरोप लगाया है कि 8 दिसंबर, 2025 को स्थानीय स्वशासन विभाग (एलएसजीडी) के प्रधान निदेशक के कार्यालय में आयोजित एक बैठक के दौरान भी परियोजना को जारी रखने के पक्ष में वही प्रशासनिक रुख दोहराया गया, जबकि जमीनी स्तर पर विफलताएं स्पष्ट हो चुकी थीं।
संगठन ने उन निर्माण गतिविधियों के लिए सार्वजनिक धन के उपयोग पर चिंता जताई है जो कथित तौर पर बिना किसी अनुमोदित विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर), मास्टर प्लान या अनिवार्य कानूनी मंजूरी के की गई हैं। संगठन का तर्क है कि परियोजना स्थल एक 'भू-विरासत' से जुड़े, पारिस्थितिक रूप से नाजुक मंदिर का हिस्सा है, जहां अवैज्ञानिक निर्माण से अपूरणीय क्षति हो सकती है।
ईपीआरसी ने इस मुद्दे को सार्वजनिक विश्वास और प्रशासनिक जवाबदेही का मामला बताते हुए एडीजी (पर्यटन) से स्पष्टीकरण मांगा है कि उनकी अध्यक्षता में लिए गए निर्णय कानून, पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों और विरासत संरक्षण मानदंडों के अनुरूप कैसे हैं।
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