चेन्नई , फरवरी 23 -- तमिलनाडु सरकार की ओर से गठित केंद्र-राज्य संबंधों पर उच्च-स्तरीय समिति अपनी रिपोर्ट का पहला भाग मुख्यमंत्री एम के स्टालिन को सौंप चुकी है और इसे राज्य विधानसभा के पटल पर भी रखा गया है। इसके बाद समिति के सदस्यों ने रिपोर्ट के दूसरे भाग पर चर्चा करने के लिए नयी दिल्ली में बैठक की।

सोमवार को यहां जारी आधिकारिक विज्ञप्ति में कहा गया है कि इस बैठक में समिति के अध्यक्ष उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश कुरियन जोसेफ और सदस्य भारतीय प्रशासनिक सेवा के सेवानिवृत्त अधिकारी एवं चेन्नई स्थित भारतीय मेरीटाइम विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति के अशोक वर्धन शेट्टी और तमिलनाडु योजना आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष डॉ एम नागनाथन शामिल हुए।

समिति ने अपनी रिपोर्ट के भाग-दो में शामिल किये जाने वाले विभिन्न विषयों पर चर्चा की। इसमें 10 अध्याय शामिल होंगे।

रिपोर्ट के भाग-एक में भाषा नीति से लेकर राज्यपाल, शिक्षा, स्वास्थ्य, परिसीमन, चुनाव, जीएसटी और अन्य 10 प्रमुख विषयों को शामिल किया गया था। विशेषता यह है कि रिपोर्ट के तमिल संस्करण को सबकी पहुंच के लिए मुफ्त किया गया है, ताकि कोई भी स्रोत का उल्लेख कर इसे पूर्ण या आंशिक रूप से इसे प्रकाशित कर सके। यह समिति के विचारों और सिफारिशों को व्यापक रूप से प्रसारित करने के लिए सुनिश्चित किया गया है।

तमिलनाडु सरकार का प्रस्ताव रिपोर्ट के भाग-एक का हिंदी, बंगाली, मराठी, तेलुगू, कन्नड़, मलयालम, ओड़िया, गुजराती, पंजाबी और असमिया जैसी 10 प्रमुख भारतीय भाषाओं में अनुवाद निकालने का भी है, और इन भाषाई संस्करणों को भी सब तक पहुंचाने के लिए मुफ्त रखने की योजना है।

अठारह फरवरी को सदन में रिपोर्ट पेश करने के बाद श्री स्टालिन ने राज्यों को अधिक स्वायत्तता और केंद्र में संघीय शासन की द्रमुक की पुरानी मांग का पुरजोर समर्थन किया और कहा कि उनकी सरकार ने आखिरकार 'बिल्ली के गले में घंटी बांध दी' है और राज्यों को अधिक शक्तियां देने वाले संवैधानिक संशोधनों की मांग की है।

श्री स्टालिन ने कहा कि उन्होंने संसद में आवश्यक संशोधन लाने के लिए बहुत जरूरी पहल की है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि राज्य सरकारों को सभी आवश्यक शक्तियां प्राप्त हों।

संघवाद अपनी वास्तविक भावना में राज्यों के लिए कोई रियायत नहीं, बल्कि राष्ट्र के लिए सुरक्षा कवच है। इसके मद्देनजर मुख्यमंत्री ने कहा कि यह एकतामें बाधा नहीं, बल्कि उसकी गारंटी है, यह सुविधा का कोई साधन नहीं, बल्कि संवैधानिक गरिमा का सिद्धांत है। श्री स्टालिन ने कहा, " इसे लिखित और व्यवहार दोनों में वास्तविक होना चाहिए। "उन्होंने उम्मीद जतायी कि यह रिपोर्ट एक सूचित संवाद को प्रोत्साहित करेगी और एक अधिक संतुलित और सहकारी संघीय व्यवस्था में योगदान देगी।

हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित