कोलकाता , जुलाई 23 -- केंद्र सरकार ने भारत-बंगलादेश सीमा पर खुफिया जानकारी जुटाने और निगरानी तंत्र को मजबूत करने के प्रयासों के तहत सहायक खुफिया ब्यूरो (एसआईबी) के लिए स्थायी ढांचा बनाने के वास्ते पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती जिलों में लगभग 50 एकड़ भूमि मांगी है।
सूत्रों के अनुसार, केंद्रीय गृह मंत्रालय ने एसआईबी कर्मियों के लिए लगभग 40 स्थानों पर स्थायी कार्यालय और आवासीय भवन बनाने का प्रस्ताव दिया है, जिनमें से प्रत्येक के लिए एक से डेढ़ एकड़ भूमि की आवश्यकता होगी। इस प्रस्ताव पर चर्चा के लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय और पश्चिम बंगाल गृह विभाग के अधिकारियों के बीच एक उच्च स्तरीय बैठक हो चुकी है।
वर्तमान में, कोलकाता को छोड़कर, राज्य में अधिकांश एसआईबी इकाइयां किराये के परिसरों से संचालित होती हैं। अब केंद्र सरकार जमीन खरीदने के लिए तैयार है, वहीं राज्य सरकार इस परियोजना के लिए सरकार के स्वामित्व वाली भूमि आवंटित करने की संभावना तलाश रही है।
सूत्रों ने कहा कि यह कदम बंगलादेश में उभरती स्थिति, घुसपैठ और सीमा पार तस्करी की बढ़ती घटनाओं तथा विदेशी खुफिया एजेंसियों की गतिविधियों की खबरों के बीच बढ़ती सुरक्षा चिंताओं के मद्देनजर उठाया गया है। इस विस्तारित ढांचे से खुफिया जानकारी जुटाने में मजबूती आने और केंद्र और राज्य सरकार दोनों को समय पर सुरक्षा अलर्ट भेजने में मदद मिलने की उम्मीद है।
इस बीच, पश्चिम बंगाल सरकार ने हाल ही में भारत-बंगलादेश सीमा से सटे नौ जिलों में सीमा चौकियों और कांटेदार तार की बाड़ लगाने के लिए सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) को 142.79 एकड़ भूमि सौंपी है। यह भूमि लंबे समय से लंबित सीमा बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को सुगम बनाने के लिए कोच बिहार, जलपाईगुड़ी, दार्जिलिंग, उत्तर दिनाजपुर, दक्षिण दिनाजपुर, मालदा, मुर्शिदाबाद, नादिया और उत्तर 24 परगना में स्थानांतरित की गयी है।
अधिकारियों ने कहा कि इस भूमि का उपयोग मुख्य रूप से नयी सीमा चौकियां बनाने और संवेदनशील इलाकों में कांटेदार तार की बाड़ का विस्तार करने के लिए किया जाएगा। इस मजबूत ढांचे से चौबीसों घंटे निगरानी में सुधार होने, बीएसएफ और जिला प्रशासनों के बीच समन्वय बढ़ने तथा घुसपैठ, तस्करी और अन्य सीमा पार अपराधों पर अंकुश लगाने के प्रयासों को बल मिलने की उम्मीद है। भूमि हस्तांतरण से उन कई लंबे समय से लंबित बाधाओं का भी समाधान हो गया है, जिन्होंने वर्षों से सीमा बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को बाधित कर रखा था। भूमि अधिग्रहण विवादों और स्थानीय आपत्तियों के कारण कई जिलों में बाड़ लगाने और चौकी निर्माण का काम अटका हुआ था।
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