चंडीगढ़ , अक्टूबर 19 -- पंजाब के पूर्व विशेष मुख्य सचिव केबीएस सिद्धू ने सोमवार को आरोप लगाया है कि केंद्र सरकार की कपड़ा क्षेत्र से जुड़ी योजनाओं में पंजाब को बेहद कम लाभ मिला है।
उन्होंने कहा कि केंद्र की कौशल प्रशिक्षण योजना के तहत पंजाब की हिस्सेदारी एक प्रतिशत से भी कम रही है, जबकि राज्य के कपास किसानों के लिए कोई केंद्रीय राहत पैकेज नहीं है। यह स्थिति तब है, जब किसानों को धान की खेती छोड़कर दूसरी फसलों की ओर रुख करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।
श्री सिद्धू के अनुसार, केंद्रीय कपड़ा मंत्रालय की समर्थ कौशल विकास योजना के तहत फरवरी 2024 तक देशभर में 2,56,985 श्रमिकों को प्रशिक्षण दिया गया था, जिनमें पंजाब के केवल 759 श्रमिक शामिल थे। यह कुल संख्या का लगभग 0.3 प्रतिशत है। उन्होंने बताया कि संशोधित प्रौद्योगिकी उन्नयन निधि योजना के तहत वित्त वर्ष 2020-21 से 2023-24 के बीच देशभर में जारी 1,868 करोड़ रुपये में से पंजाब की इकाइयों को 73 करोड़ रुपये मिले, जो लगभग 3.9 प्रतिशत है। इस दौरान गुजरात को करीब आधी राशि मिली। मार्च 2022 के बाद से नई कपड़ा इकाइयों के लिए पूंजीगत सब्सिडी भी उपलब्ध नहीं रही है।
उन्होंने कहा कि लुधियाना देश के सर्दियों के कपड़ों की जरूरत का बड़ा हिस्सा पूरा करता है लेकिन केंद्र की कपड़ा योजनाओं में इस औद्योगिक केंद्र को अपेक्षित स्थान नहीं मिला। उन्होंने कहा कि केंद्र अब 25,000 करोड़ रुपये की समर्थ-2.0 योजना तैयार कर रहा है। यदि इसमें पुरानी व्यवस्था ही जारी रही, तो इसका लाभ फिर तिरुपुर, बेंगलुरु और सूरत जैसे केंद्रों को अधिक मिलेगा और पंजाब पीछे रह जाएगा। कपास की खेती में गिरावट पर चिंता जताते हुए श्री सिद्धू ने कहा कि पंजाब में चालू खरीफ सीजन के दौरान कपास का रकबा घटकर लगभग 80,000 हेक्टेयर रह गया है, जो अब तक का सबसे कम स्तर बताया जा रहा है। वर्ष 2020 में यह रकबा पांच लाख हेक्टेयर से अधिक था। उन्होंने इसके लिए गुलाबी सुंडी के बार-बार हमलों और खरीद को लेकर अनिश्चितता को जिम्मेदार बताया। उनके अनुसार, राज्य सरकार की ओर से बीज पर 33 प्रतिशत सब्सिडी दिए जाने के बावजूद कपास की खेती में गिरावट नहीं थमी है।
पूर्व विशेष मुख्य सचिव ने कहा कि किसानों से भूजल बचाने के लिए धान की जगह दूसरी फसलें उगाने को कहा जाता है लेकिन कपास उगाने पर उन्हें कीटों के हमलों, सुनिश्चित खरीद की कमी और फसल मंडी में पहुंचने के समय शुल्क-मुक्त आयात से जुड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि फसल विविधीकरण को बढ़ावा देने की नीति और आयात संबंधी फैसलों के बीच तालमेल होना चाहिए। उन्होंने बताया कि कच्चे कपास के आयात पर सीमा शुल्क छूट 31 अक्टूबर को समाप्त होनी है और इसे दिसंबर तक बढ़ाने पर विचार किया जा रहा है। पंजाब की मालवा मंडियों में नरमे की आवक सितंबर के अंतिम सप्ताह से दिसंबर तक होती है। ऐसे में छूट बढ़ने से किसानों की बिक्री के मौसम में आयातित कपास से प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है।
श्री सिद्धू ने राष्ट्रीय स्तर पर कपास का भंडार लगभग 93.59 लाख गांठ होने का भी उल्लेख किया। उनके अनुसार, अबोहर मंडी में सितंबर के मध्य कपास का भाव करीब 9,025 रुपये प्रति क्विंटल था, जो अक्टूबर की शुरुआत में बठिंडा में लगभग 8,200 रुपये प्रति क्विंटल रह गया। उन्होंने कपड़ा, कौशल विकास, राजस्व तथा कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालयों के केंद्रीय सचिवों को संयुक्त रूप से पत्र लिखकर कई मांगें रखी हैं। इनमें समर्थ-2.0 योजना में लुधियाना जैसे उपेक्षित औद्योगिक केंद्रों के लिए सुनिश्चित हिस्सेदारी, नई वस्त्र विस्तार एवं रोजगार योजना के तहत लुधियाना के होजरी उद्योग को पात्रता, मालवा की सभी मंडियों में भारतीय कपास निगम के माध्यम से पूरी खरीद सुनिश्चित करना तथा उत्तर भारत में कपास की कटाई के महीनों के दौरान शुल्क-मुक्त आयात पर सीमा लगाने के उपाय शामिल हैं। उन्होंने पंजाब सरकार से भी आग्रह किया कि योजना के दिशा-निर्देश अधिसूचित होने से पहले राज्य की ओर से केंद्र को ठोस प्रस्ताव भेजा जाए।
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