कृष्णानगर , अक्टूबर 19 -- पश्चिम बंगाल में सौमिशचंद्र रॉय के निधन के बाद कृष्णानगर राजबाड़ी में 24 साल पुरानी परंपरा समाप्त हो गई है। वर्ष 2002 में शुरू हुई विजयादशमी पर सिंदूर खेला की परंपरा इस बार पहली बार नहीं निभाई गई।

इस फैसले से नदिया जिले के शहर में भक्त और निवासी निराश हैं जबकि शाही परिवार की 400 साल पुरानी राजराजेश्वरी दुर्गा पूजा अपनी पूरी रीतियों-रिवाजों के साथ जारी तो है लेकिन इसकी भव्यता भी बहुत हद तक फीकी दिख्राई दी है।

कृष्णनगर के राजपरिवार के मुखिया रॉय का इस साल मार्च में निधन हो गया था। उनके निधन के कारण इस वर्ष परिवार के लिए दुर्गा पूजा एक अभूतपूर्व अवसर बन गई है। इसके चलते कुछ धार्मिक अनुष्ठानों के आयोजन के तरीके और उत्सव के स्वरूप में बदलाव किए गए हैं।

अमृता रॉय, जिन्होंने 2002 में 'सिंदूर खेला' परंपरा की शुरुआत की थी, उन्होंने कहा कि इस साल दशमी के दिन यह रस्म नहीं निभाई जाएगी। उन्होने कहा. "मैंने देवी से बस इतना ही मांगा था। जब उन्होंने यह नहीं दिया तो इसे स्वीकार कर लेना ही बेहतर है।" उन्होंने कहा कि अगर उसका बेटा शादी के बाद भी इस परंपरा को जारी रखना चाहे तो यह उसका अपना फैसला होगा और वह उस पर कोई दबाव नहीं डालेगी।

बदलावों के बारे में बताते हुए अमृता रॉय ने कहा कि उनके पति के निधन के कारण इस साल की पूजा अलग होगी। परिवार के सदस्य गर्भगृह में प्रवेश नहीं करेंगे और उनके नाम से पूजा भी नहीं की जाएगी। पुजारी ने अनुष्ठान संपन्न कराने की जिम्मेदारी ली है जिसमें विजया दशमी के दिन देवी का पारंपरिक स्वागत भी शामिल है।

मूर्ति का आकार भी थोड़ा छोटा कर दिया गया है जबकि राजबाड़ी के भव्य खंभों और पूजा परिसर के आसपास की सजावटी रोशनी को भी कम किया जा सकता है। इस साल पारंपरिक शहनाई या सनाई का वादन भी बंद रखा जा सकता है। हालांकि, शाही परिवार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि मितव्ययिता का असर ज़रूरी धार्मिक अनुष्ठानों पर नहीं पड़ेगा। पारंपरिक रीति-रिवाज बिना किसी बदलाव के जारी रहेंगे, जिनमें गन्ने, कद्दू और केले की प्रतीकात्मक बलि भी शामिल है।

ये बदलाव ऐसे समय में हो रहे हैं जब राजराजेश्वरी पूजा कृष्णनगर की सबसे पुरानी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं में से एक बनी हुई है। यह पूजा 1710 में महाराजा कृष्णचंद्र के जन्म से भी पहले की है। माना जाता है कि बंगाल में आम लोगों के बीच दुर्गा पूजा को लोकप्रिय बनाने का श्रेय उन्हीं को जाता है। इसलिए, शाही परिवार द्वारा की जाने वाली इस पूजा का इतिहास चार सदियों से भी अधिक पुराना है।

पूजा की एक और स्थायी विशेषता नौ दिनों तक चलने वाला 'होम' या पवित्र अग्नि अनुष्ठान है, जिसे पारंपरिक रूप से महालया के बाद प्रतिपदा तिथि से शुरू किया जाता है और नवमी की पूजा के बाद ही समाप्त किया जाता है। रविवार को राजबाड़ी में यह होम शुरू किया गया, जिसमें लोगों के कल्याण के लिए आहुतियां दी गईं।

शाही परिवार के सूत्रों ने बताया कि इस अनुष्ठान में कभी पूरे चंदन के पेड़ के साथ-साथ भारी मात्रा में घी, बेल के पत्ते, केले और अन्य पूजन सामग्री की आवश्यकता होती थी। इससे निकलने वाला सुगंधित धुआं आसपास के पूरे इलाके में फैल जाता था। कहा जाता है कि महाराजा क्षौनीशचंद्र के शासनकाल में, इस अनुष्ठान की अग्नि में पूरा चंदन का पेड़ जल गया था। उनके निधन के बाद, इस परंपरा में चंदन की जगह बेल की लकड़ी का उपयोग होने लगा।

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