नैनीताल , मार्च 11 -- उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने हरिद्वार में कृषि एवं बागवानी की भूमि पर अवैध रूप से प्लाटिंग और ग्रुप हाउसिंग की अनुमति देने के मामले में सख्त रुख अपनाया है। न्यायालय ने हरिद्वार-रुड़की विकास प्राधिकरण (एचआरडीए) को एक सप्ताह के भीतर अपने आदेश वापस लेने के निर्देश दिए हैं। ऐसा न करने पर अदालत ने अवमानना की कार्रवाई शुरू करने की चेतावनी दी है।

मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने इस मामले में दायर जनहित याचिका पर बुधवार को सुनवाई करते हुए यह निर्देश जारी किए।

मामले में हरिद्वार निवासी अतुल कुमार चौहान ने जनहित याचिका दायर कर कहा कि उच्च न्यायालय ने 19 जून 2018 को एक जनहित याचिका में आदेश दिया था कि कृषि एवं बागों की भूमि पर प्लाटिंग और ग्रुप हाउसिंग की अनुमति नहीं दी जा सकती, क्योंकि प्रदेश में कृषि और बागों की भूमि सीमित है।

इस आदेश के खिलाफ राज्य सरकार ने उच्चतम न्यायालय में विशेष अपील दायर की थी। गत 30 अप्रैल 2024 को शीर्ष न्यायालय ने राज्य सरकार की अपील निस्तारित करते हुए कहा कि उच्च न्यायालय के आदेश में हस्तक्षेप करने की आवश्यकता नहीं है। साथ ही यह भी कहा कि यदि राज्य सरकार चाहे तो आदेश में संशोधन के लिए उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकती है लेकिन राज्य सरकार ने ऐसा नहीं किया।

याचिका में आरोप लगाया गया कि इसके बावजूद हरिद्वार-रुड़की विकास प्राधिकरण ने अपनी बोर्ड बैठक में विधिक राय के आधार पर कृषि एवं बागों की भूमि पर प्लाटिंग की अनुमति देने का आदेश जारी कर दिया। इससे हरिद्वार के कई क्षेत्रों में कृषि और बाग की भूमि तेजी से समाप्त होती जा रही है।

याचिकाकर्ता ने यह भी बताया कि 04 सितंबर 2023 को उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा था कि यदि कृषि भूमि पर प्लाटिंग पर रोक है तो उसका कड़ाई से अनुपालन कराया जाए। इसके बावजूद आज तक इन आदेशों का पालन नहीं किया गया और कृषि भूमि पर प्लाटिंग की अनुमति दी जाती रही।

मामले की सुनवाई के बाद उच्च न्यायालय ने एचआरडीए को एक सप्ताह के भीतर अपने आदेश वापस लेने के निर्देश देते हुए स्पष्ट किया कि आदेश का पालन नहीं होने पर अवमानना की कार्यवाही की जाएगी।

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