श्योपुर , जुलाई 19 -- मध्यप्रदेश के श्योपुर जिले स्थित कूनो राष्ट्रीय उद्यान प्रबंधन ने कहा है कि चीता परियोजना की सफलता का वास्तविक श्रेय उन फील्ड कर्मचारियों, ट्रैकर्स, पशु चिकित्सकों और वन अधिकारियों को जाता है, जो भीषण गर्मी, बारिश और दुर्गम परिस्थितियों में दिन-रात चीतों की निगरानी और देखभाल में जुटे रहते हैं।कूनो प्रबंधन की ओर से जारी ताजा न्यूज बुलेटिन के अनुसार फिलहाल कूनो और आसपास के क्षेत्रों में 49 चीतों का प्रबंधन किया जा रहा है। इनमें 30 चीतों के गले में सैटेलाइट कॉलर लगे हैं, जिनकी लगातार निगरानी की जाती है। वहीं 20 चीते मध्यप्रदेश और राजस्थान के 12 जिलों में खुले जंगलों में विचरण कर रहे हैं, जबकि अन्य बड़े बाड़ों में रखे गए हैं।

बुलेटिन में बताया गया है कि फील्ड टीमें प्रतिदिन जंगल, पहाड़, नदी किनारों और कृषि क्षेत्रों में चीतों की लोकेशन ट्रैक करती हैं। गर्मियों में 45 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान और मानसून में उफनती नदियों के बीच भी निगरानी का कार्य लगातार जारी रहता है। कई बार टीम के सदस्यों को घंटों वाहन से यात्रा करने या कई किलोमीटर पैदल चलकर चीतों तक पहुंचना पड़ता है।

प्रबंधन के अनुसार वन्यजीव चिकित्सकों की भूमिका केवल उपचार तक सीमित नहीं है। उन्हें चीतों का स्वास्थ्य परीक्षण, रेस्क्यू अभियान, आवश्यकता पड़ने पर बेहोश करने की प्रक्रिया तथा मादा चीतों और शावकों की विशेष देखभाल की जिम्मेदारी भी निभानी पड़ती है। कई बार बचाव अभियानों के लिए दो राज्यों में सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा करनी पड़ती है। भारी बारिश के दौरान बेहोश किए गए चीतों की सुरक्षा तथा ऑक्सीजन सिलेंडर, ड्रिप और अन्य चिकित्सीय उपकरणों का संचालन भी उनकी जिम्मेदारी का हिस्सा होता है।

बुलेटिन में कहा गया है कि परियोजना केवल चीतों को जंगल में छोड़ने तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्हें भारत की जलवायु, शिकार, वनस्पति, परजीवियों, अन्य वन्यजीवों तथा मानव-वन्यजीव सह-अस्तित्व वाले वातावरण के अनुरूप ढालने की सतत प्रक्रिया भी शामिल है। इस दौरान वन विभाग की टीम अपने अनुभवों के आधार पर रणनीतियों में लगातार सुधार करती रहती है।

कूनो प्रबंधन ने कहा कि यह परियोजना किसी एक अधिकारी या विभाग की नहीं, बल्कि पूरी टीम के सामूहिक प्रयास का परिणाम है। भारत में चीते की वापसी दुनिया का पहला अंतरमहाद्वीपीय चीता पुनर्वास अभियान माना जाता है और इसकी सफलता के पीछे गुमनाम वनकर्मी, ट्रैकर्स और पशु चिकित्सकों का समर्पण सबसे महत्वपूर्ण आधार है।

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