चंडीगढ़/पटियाला , सितंबर 16 -- पंजाब सरकार के पूर्व विशेष मुख्य सचिव एवं सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी केबीएस सिद्धू ने किशाऊ बहुउद्देश्यीय परियोजना को लेकर केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल को पत्र लिखकर पंजाब को अपर यमुना रिवर बोर्ड का पूर्ण सदस्य बनाने की मांग की है।

उन्होंने कहा है कि केंद्र सरकार द्वारा परियोजना को मंजूरी के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल के समक्ष भेजे जाने से पहले पंजाब को निर्णय प्रक्रिया में शामिल किया जाना चाहिए।

श्री सिद्धू ने यह पत्र एक निजी नागरिक के तौर पर लिखा है। उन्होंने कहा कि 15 सितंबर को नई दिल्ली में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली के मुख्यमंत्रियों द्वारा किशाऊ परियोजना संबंधी समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए, लेकिन पंजाब को इसमें शामिल नहीं किया गया और न ही उससे परामर्श किया गया। केंद्र ने किशाऊ परियोजना को राष्ट्रीय परियोजना घोषित करते हुए इसके जल घटक की लागत का 90 प्रतिशत वहन करने की बात कही है।

पूर्व अधिकारी ने कहा कि यह मुद्दा केवल पानी की मात्रा या हिस्सेदारी का नहीं, बल्कि यमुना बेसिन से जुड़े निर्णयों में पंजाब की भागीदारी का है। उनके अनुसार, 1994 में बेसिन राज्यों के बीच यमुना जल के बंटवारे के बाद से पंजाब को अपर यमुना रिवर बोर्ड में स्थान नहीं मिला है।

श्री सिद्धू ने अपने पत्र में कहा कि हरियाणा आज भी रावी-ब्यास के पानी पर यह तर्क देता है कि एक नवंबर 1966 को पंजाब के पुनर्गठन से पहले उसका क्षेत्र अविभाजित पंजाब का हिस्सा था। उनके अनुसार, इसी तर्क के आधार पर पंजाब का यमुना से संबंध भी 1966 के बाद पूरी तरह समाप्त नहीं माना जाना चाहिए, क्योंकि अविभाजित पंजाब का क्षेत्र अंबाला जिले के जगाधरी-यमुनानगर क्षेत्र के माध्यम से यमुना से जुड़ा था।

उन्होंने तर्क दिया कि यदि हरियाणा 1966 से पहले की स्थिति के आधार पर रावी-ब्यास पर अपना दावा जारी रख सकता है तो उसी आधार पर पंजाब को यमुना संबंधी संस्थागत निर्णयों में अपनी बात रखने का अधिकार मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि इस तर्क को केवल एक दिशा में लागू नहीं किया जा सकता।

श्री सिद्धू ने स्पष्ट किया कि पंजाब किशाऊ परियोजना से दिल्ली या राजस्थान को मिलने वाले पेयजल का विरोध नहीं कर रहा है। उन्होंने कहा कि पंजाब ने पहले भी हरियाणा के कौशल्या बांध के लिए अनापत्ति दी थी, जिससे पंचकूला को पेयजल उपलब्ध कराया जाता है। उन्होंने कहा कि पंजाब की आपत्ति किसी राज्य को पेयजल उपलब्ध कराने से नहीं, बल्कि नदी बेसिन के जल संबंधी फैसलों में पंजाब को लगातार बाहर रखे जाने से है।

श्री सिद्धू ने केंद्रीय जल शक्ति मंत्री से मांग की कि किशाऊ परियोजना का प्रस्ताव केंद्रीय मंत्रिमंडल के पास भेजे जाने से पहले तीन कदम उठाए जाएं। इनमें केंद्रीय मंत्रिमंडल के नोट में पंजाब को बाहर रखने के आधार को दर्ज करना, पंजाब को अपर यमुना रिवर बोर्ड का पूर्ण सदस्य बनाना तथा 1994 के यमुना जल आवंटन की समीक्षा के दौरान पंजाब को अपनी बात रखने का अवसर देना शामिल है।

पत्र की प्रतियां केंद्रीय गृह मंत्री, पंजाब के मुख्य सचिव, जल संसाधन विभाग के सचिव, केंद्रीय जल आयोग के अध्यक्ष और अपर यमुना रिवर बोर्ड के सदस्य सचिव को भी भेजी गई हैं। पंजाब के मुख्य सचिव को भेजी गई प्रति में राज्य सरकार से इस मुद्दे पर अपनी ओर से औपचारिक प्रतिनिधित्व करने पर विचार करने का आग्रह किया गया है।

श्री सिद्धू ने यह भी कहा कि किशाऊ समझौते पर हस्ताक्षर के बाद पंजाब में राजनीतिक दलों, दबाव समूहों और जल अधिकारों से जुड़े कार्यकर्ताओं की ओर से इस मुद्दे पर सार्वजनिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। उन्होंने कहा कि केंद्र का इस मामले में लिया गया रुख पंजाब के लिए महत्वपूर्ण नजीर कायम करेगा। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि यदि किसी उत्तराधिकारी राज्य को उस नदी बेसिन में अपना पूर्व संस्थागत अधिकार बनाए रखने की अनुमति है, जिसमें वह पुनर्गठन से पहले शामिल था, तो पंजाब को यमुना से जुड़े संस्थागत ढांचे में स्थान मिलना चाहिए। इसके विपरीत, यदि वर्तमान भौगोलिक स्थिति ही एकमात्र आधार मानी जाती है, तो उनके अनुसार रावी-ब्यास पर हरियाणा के मौजूदा या भविष्य के दावे पर भी सवाल उठेगा।

श्री सिद्धू ने कहा कि केंद्र सरकार का निर्णय पंजाब के नदी जल संबंधी अधिकारों के संदर्भ में महत्वपूर्ण मिसाल कायम कर सकता है।

हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित