जालौन , अगस्त 03 -- उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड अंचल में यमुना तट पर बसी ऐतिहासिक नगरी कालपी अपनी सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और धार्मिक विरासत के लिए विख्यात है। महर्षि वेदव्यास, भगवान श्रीकृष्ण और अनेक ऐतिहासिक घटनाओं से जुड़ी यह नगरी भगवान शिव के नौ दिव्य स्वरूपों 'नवेश्वर महादेव' के कारण भी करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। मान्यता है कि इन नौ शिवालयों के श्रद्धापूर्वक दर्शन और पूजन से भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं तथा उन्हें पुण्य और आध्यात्मिक कल्याण की प्राप्ति होती है।

वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. हरी मोहन पुरवार के अनुसार भगवान शिव प्रातः स्मरणीय देव हैं। शास्त्रों में वर्णित है कि जो श्रद्धालु प्रातःकाल भगवान शंकर का स्मरण करता है, उसके समस्त भय, कष्ट और बाधाएं दूर हो जाती हैं। शिव संसार रूपी रोग के नाशक हैं और इसी कारण कालपी में उनके विभिन्न स्वरूपों की आराधना की परंपरा सदियों से चली आ रही है।

उन्होंने बताया कि भगवान भोलेनाथ को नौ अंक अत्यंत प्रिय माना जाता है। अंकशास्त्र में नौ पूर्णता, सिद्धि और नवशक्ति का प्रतीक है। इसी आध्यात्मिक अवधारणा के आधार पर कालपी में भगवान शिव के नौ प्रमुख स्वरूपों को "नवेश्वर" के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त हुई है।

डॉ. पुरवार ने बताया कि महाभारत के अनुशासन पर्व, स्कंद पुराण, पद्मपुराण और ब्रह्माण्ड पुराण में भगवान शिव को समस्त कामनाओं के अधीश्वर तथा शिवलिंग को सृष्टि के मूल स्वरूप के रूप में वर्णित किया गया है। इन ग्रंथों के अनुसार श्रद्धा से शिव आराधना करने वाला व्यक्ति ऐश्वर्य, ज्ञान और मोक्ष का अधिकारी बनता है।

नवेश्वरों में सबसे प्राचीन और पूजनीय पातालेश्वर महादेव का मंदिर कालपी किले के पश्चिमी भाग में यमुना के दक्षिणी तट पर स्थित है। मान्यता है कि यह मंदिर पांच हजार वर्ष से भी अधिक प्राचीन है। द्वापर युग में यहां प्रतिष्ठित शिवलिंग मणिकेश्वर महादेव के नाम से प्रसिद्ध था। ब्रह्माण्ड पुराण के कालपी महात्म्य में उल्लेख है कि इनके दर्शन मात्र से महापाप नष्ट हो जाते हैं और साधकों को मोक्ष की प्राप्ति होती है।

कालपी रेलवे स्टेशन के निकट तरीबुल्दा मोहल्ले में स्थित ढोढेश्वर महादेव मंदिर लगभग एक शताब्दी पुराना माना जाता है। जनश्रुति के अनुसार नाग बाबा के शिष्य ढोढे केवट ने अपने गुरु की प्रेरणा से यहां शिवलिंग की स्थापना की थी। मंदिर की भव्य वास्तुकला, बलुआ पत्थर की नक्काशी तथा शिव-पार्वती, ब्रह्मा, श्रीराम परिवार, राधा-कृष्ण, गणेश और सिंहवाहिनी दुर्गा की प्रतिमाएं इसकी विशेष पहचान हैं।

रावगंज मोहल्ले में स्थित फालेश्वर महादेव को मनोकामना पूर्ण करने वाला शिवधाम माना जाता है। यहां प्रतिदिन प्रातः और सायंकाल नियमित आरती तथा जलाभिषेक होता है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि सच्ची श्रद्धा से पूजा करने पर भगवान शिव उनकी प्रत्येक इच्छा पूर्ण करते हैं।

लगभग सौ वर्ष पूर्व स्थापित लुढ़केश्वर महादेव अपनी अनूठी परंपरा के लिए प्रसिद्ध हैं। मान्यता है कि जो श्रद्धालु विशेष मनोकामना लेकर अपने घर से मंदिर तक लुढ़कते हुए पहुंचता है, उसकी इच्छा अवश्य पूरी होती है। इसी परंपरा के कारण इस मंदिर का नाम लुढ़केश्वर पड़ा।

राजघाट के समीप स्थित बानेश्वर महादेव का मंदिर अत्यंत प्राचीन माना जाता है। जनश्रुति के अनुसार प्राचीन काल में यहां घना वन था, जहां काल्पदेव ने अग्नि से रक्षा के लिए भगवान शिव की आराधना की थी। इसी कारण इस स्थान का नाम वन के ईश्वर-बानेश्वर पड़ा। यहां शिव और विष्णु की अभिन्नता का संदेश भी दिया जाता है।

आगापुर क्षेत्र स्थित तिगड़ेश्वर महादेव का मंदिर आकार में छोटा, किंतु धार्मिक महत्व की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। स्थानीय मान्यता है कि संसार की तिकड़म, मोह-माया और मानसिक उलझनों से मुक्ति की कामना लेकर आने वाले श्रद्धालुओं की भगवान शिव विशेष कृपा करते हैं।

रावगंज स्थित गोपेश्वर महादेव के संबंध में मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति प्राप्त करने के लिए गोपियों ने यहां भगवान शिव की आराधना की थी। प्रारंभ में यहां मिट्टी का शिवलिंग था, जिसे बाद में पत्थर के शिवलिंग से प्रतिस्थापित किया गया। यह मंदिर शिव और कृष्ण भक्ति के अद्भुत समन्वय का प्रतीक माना जाता है।

रावगंज मोहल्ले में स्थित रामेश्वर महादेव का प्राचीन मंदिर स्थानीय श्रद्धालुओं की विशेष आस्था का केंद्र है। लगभग एक शताब्दी पूर्व लल्लो दादी पुरवार के सहयोग से यहां पुनः प्राण प्रतिष्ठा कराई गई थी। मान्यता है कि यहां पूजा करने से भगवान श्रीराम और भगवान शिव दोनों का आशीर्वाद एक साथ प्राप्त होता है।

अदलसराय मोहल्ले में स्थित भोलेश्वर महादेव भगवान शिव के सरल, कृपालु और भक्तवत्सल स्वरूप का प्रतीक माने जाते हैं। यहां प्रतिदिन नियमित आरती, पूजन और जलाभिषेक होता है। शिवपुराण में वर्णित शिव के सत्य, ज्ञान, अनंत और चिदानंद स्वरूप की झलक इस मंदिर की आध्यात्मिक परंपरा में देखने को मिलती है।

कालपी के नवेश्वर महादेव केवल पूजा-अर्चना के केंद्र नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, पुराण परंपरा और आध्यात्मिक विरासत के जीवंत प्रतीक हैं। ब्रह्माण्ड पुराण के कालपी महात्म्य में वर्णित है कि इन नौ शिवालयों के दर्शन एवं पूजन से भक्तों को कार्यसिद्धि, सुख-समृद्धि और आध्यात्मिक कल्याण की प्राप्ति होती है।

यमुना तट पर स्थित यह प्राचीन धार्मिक धरोहर आज भी हजारों श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करती है। सावन, महाशिवरात्रि और अन्य प्रमुख पर्वों पर यहां दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं और नवेश्वर महादेव के दर्शन कर सुख, शांति, समृद्धि एवं शिव कृपा की कामना करते हैं। धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से कालपी के नवेश्वर महादेव बुंदेलखंड ही नहीं, बल्कि संपूर्ण उत्तर भारत की शिवभक्ति परंपरा की अमूल्य धरोहर माने जाते हैं।

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