फरीदकोट , मई 11 -- अंतरराष्ट्रीय नर्स दिवस की पूर्व संध्या पर सोमवार को यहां सरकारी नर्सिंग कॉलेज में आयोजित एक कार्यक्रम में डॉ नरेश पुरोहित ने कहा कि पेशेवर नर्सों में काम से जुड़ी चिंता (वर्क एंग्जायटी) सबसे आम मानसिक स्वास्थ्य समस्या है।
इसके बाद अवसाद, तनाव, थकान और अनिद्रा जैसी समस्याएं सामने आती हैं। उन्होंने कहा कि लंबी ड्यूटी शिफ्ट, लगातार काम का दबाव और पर्याप्त नींद न मिलना नर्सों के स्वास्थ्य और कार्यक्षमता पर बुरा असर डाल रहा है। औसतन नर्सें कम नींद ले पा रही हैं।
डॉ. पुरोहित ने कहा कि भारतीय नर्सों को कम वेतन, लंबे कार्य घंटे और बेहतर प्रशिक्षण की कमी जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, जबकि अस्पतालों में कुशल नर्सिंग स्टाफ की भारी कमी है। उन्होंने बताया कि भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र में नर्सिंग कार्यबल कुल स्वास्थ्य कर्मियों का लगभग दो-तिहाई है, लेकिन देश में प्रति 1000 आबादी पर केवल 1.7 नर्सें हैं, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों से 43 प्रतिशत कम है। मानक पूरा करने के लिए भारत को करीब 24 लाख अतिरिक्त नर्सों की जरूरत है। भारतीय नर्सिंग परिषद के अनुसार देश में करीब 33.41 लाख पंजीकृत नर्सिंग कर्मी हैं, जिनमें पंजीकृत नर्सें, दाइयां, सहायक नर्स मिडवाइफ और महिला स्वास्थ्य आगंतुक शामिल हैं।
उन्होंने कहा कि भारत में 90 प्रतिशत से अधिक नर्सें महिलाएं हैं, लेकिन स्वास्थ्य व्यवस्था में उन्हें स्वतंत्र पेशेवर के रूप में मान्यता नहीं मिलती और वे डॉक्टरों और अस्पताल प्रबंधन के अधीन रहती हैं।
डॉ. पुरोहित ने कहा कि नर्सें स्वास्थ्य व्यवस्था और अस्पतालों की रीढ़ हैं, लेकिन जब वे स्वायत्तता, कानूनी मान्यता या बुनियादी सुविधाओं जैसे चेंजिंग रूम, शौचालय और बेहतर कार्य वातावरण की मांग करती हैं, तो उनकी आवाज अनसुनी कर दी जाती है। उन्होंने कहा कि समय के साथ नर्सों की भूमिका लगातार विकसित हुई है और आज वे स्वास्थ्य व्यवस्था की सबसे मजबूत कड़ी बन चुकी हैं।
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