जयपुर , अक्टूबर 19 -- राजस्थान में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ ने कांग्रेस पर देश के संविधान एवं संवैधानिक व्यवस्थाओं को नहीं मानने का आरोप लगाते हुए कहा है कि उसकी आस्था संविधान निर्माता डॉ भीमराव अंबेडकर में नहीं बल्कि बंगलादेश की जमात में नजर आ रही है।
श्री राठौड़ ने सोमवार को अपने बयान में कहा कि कांग्रेस ना संविधान को मानती है ना ही देश की संवैधानिक व्यवस्थाओं को मानती है, जो देश को मजबूत करने के लिए बाबा साहब अंबेडकर ने बनाई थी। कांग्रेस की आस्था आज भी बाबा साहब में नहीं है, इससे पहले भी चाहे उन्हें चुनाव में हराने के लिए फर्जी तरीके से वोटों को निरस्त करने का मामला हो या फिर उन से जुड़े हुए पंचतीर्थों की सुध नहीं लेना हो। यह कांग्रेस का चरित्र है कि उसे भारत के स्वाभिमान को बढ़ाने वाली या भारत को जड़ों से जोड़ने वाले किसी भी विचार के प्रति कोई भी लगाव नहीं है। ये ही कारण है कि जब वे आज आंदोलन कर रहे है तो भारत के संविधान में आस्था रखते हुए नहीं, बल्कि बंगलादेशी जमात से प्रेरणा लेकर कर रहे है।
उन्होंने कहा कि कांग्रेस बातें मोहब्बत की दुकान की करती है, लेकिन सच में यह झूठ की दुकान है। कांग्रेसी नेता झूठ बोलते है और झूठ रचते है। पहले कहते है मतदाता सूचियों में फर्जी नाम है, अब कह रहे है कि नाम क्यों काटे। कभी हाथ में संविधान की किताब रखकर भाषण देने वाले कांग्रेस नेता राहुल गांधी से पूछना चाहते है कि अब वो संविधान कहां है। अब उनके हाथ में मोबाइल है, जिसमें स्क्रीप्ट लिखी है।
श्री राठौड़ ने आरोप लगाते हुए कहा कि विदेशी तंत्र से संचालित देश का नेता प्रतिपक्ष जिस तरह का आचरण कर रहा है वह गैर जिम्मेदाराना और निदंनीय है। उन्होंने कहा कि भारत की समृद्धि के लिए व्यवसाय जरूरी है और त्योहारी सीजन में जब बाजार बढ़ता है तो उस समय आंदोलन के नाम की नौटंकी कर देश का आर्थिक रूप से नुकसान पहुंचाने का एक षड़यंत्र कांग्रेस रच रही है।
उन्होंने कहा कि राजनीति का सबसे दुखद पहलू यह है कि इसमें से 'तथ्य' गायब हो चुके हैं और उनकी जगह 'सुविधाजनक झूठ' ने ले ली है। सोशल मीडिया से लेकर सड़क के मंचों तक, बिना किसी सबूत के ऐसे नेरेटिव गढ़े जा रहे हैं जिनका वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं है। जब कांग्रेस हारती है, तो वह अपनी संगठनात्मक कमजोरियों पर मंथन करने के बजाय सीधे ईवीएम पर दोष मढ़ देती है। यह झूठ इतनी बार और इतने ऊंचे स्वर में बोला जाता है कि आम जनता के मन में व्यवस्था के प्रति एक स्थाई संदेह पैदा हो जाए। बिना तथ्यों के इस तरह का दुष्प्रचार देश के लोकतंत्र की जड़ों को खोखला कर रहा है।
उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की आत्मा उसके भीतर उठने वाली असहमतियों और विरोधी आवाजों में बसती है। किसी भी जीवंत लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए रचनात्मक आलोचना और वैचारिक मतभेद एक ईंधन की तरह काम करते हैं, जो सरकार को निरंकुश होने से रोकते हैं लेकिन जब यही असहमति तथ्यों के बजाय अफवाहों पर और संवाद के बजाय सड़कों पर हिंसा या संस्थाओं को कमजोर करने की जिद पर उतर आए, तो वह असहमति नहीं बल्कि अराजकता का रूप ले लेती है।
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