जयपुर , जनवरी 19 -- राजस्थान में आयोजित जयपुर साहित्य उत्सव-2026 (जेएलएफ) पांचवे दिन कविता, मांगा क़ॉमिक्स, मिथक, विज्ञान, इतिहास, चिकित्सा और समकालीन कथा साहित्य पर मनोरंजक और ज्ञानवद्धर्क चर्चाओं के साथ सम्पन्न हो गया।

वेदांता द्वारा प्रस्तुत जेएलएफ के अंतिम दिन ब्रिटिश कवयित्री एलिस ऑसवाल्ड ने सुबह के सत्र में दर्शकों को कविता और साहित्य के जादू से परिचित कराया। ए जर्नी थ्रू वर्ड्स एंड वर्ल्ड्स नाम के इस सत्र की शुरुआत इंद्रधनुष की ग्रीक देवी आइरिस के आह्वान से हुई। ऑसवाल्ड की कविताएं समय, जल, मृत्यु, स्मृति और मानवीय संबंध जैसे विषयों के बीच बहुत ख़ूबसूरत आवाजाही करती हैं। इस सत्र में अ शॉर्ट स्टोरी ऑफ़ फ़ॉलिंग और अ बैरिस्टर फ़ॉर द डॉन के पाठ शामिल थे, जहां ऑसवाल्ड ने कविता में दोहराव को एक बुनियादी तत्व के रूप में रेखांकित किया।

दृश्यात्मक कहानी कहने की परंपरा और लोकप्रिय वैश्विक संस्कृति पर केंद्रित सत्र सेलिब्रेटिंग मांगा एंड ग्राफ़िक नॉवेल्स में, दुनिया की सबसे प्रभावशाली कॉमिक्स में से एक मांगा और ग्राफ़िक नॉवेल्स पर चर्चा हुई। इस सत्र में अ साइलेंट वॉइस की लेखिका योशितोकी ओइमा, उनकी अनुवादक तोमोको किकुची और ज़ोरावर एंड द लॉस्ट गॉड्स के सह-लेखक उजान दत्ता और अबीर कपूर, राधिका झा के साथ बातचीत में शामिल हुए। ओइमा ने अपनी श्रृंखला अ साइलेंट वॉइस में बुलीइंग, दोस्ती और संवाद जैसे विषयों पर अपने रचनात्मक चुनावों पर बात की। सभी लेखकों ने कॉमिक्स में पाठ के साथ तस्वीरों की ताक़त पर चर्चा की। अबीर कपूर ने कहा कि मांगा में दृढ़ता, साहस, परिवार, दोस्ती जैसे विषयों को व्यक्त करने की प्रभावशाली क्षमता होती है, जिसे उपन्यास या फ़िल्म जैसी अन्य रचनात्मक विधाएं उसी तरह व्यक्त नहीं कर पातीं।

मिथक और कल्पना ने द लीजेंड ऑफ़ कुमारीकंदम सत्र को आकार दिय जहां आनंद नीलकंठन और मृदुला रमेश ने लुप्त सभ्यताओं, मिथकों की स्थाई शक्ति पर चर्चा करते हुए बताया कि किस तरह कहानी कहने की परंपरा सांस्कृतिक स्मृति और पहचान को लगातार गढ़ती रहती है। सत्र की शुरुआत आनंद नीलकंठन की पुस्तक 'महिषासुर: द लीजेंड ऑफ़ कुमारीकंदम' के एक आकर्षक वीडियो ट्रेलर से हुई, जो मिथक, साइंस फ़िक्शन और फ़ैंटेसी को सहजता से जोड़ता है। इस पुस्तक की प्रेरणा पर बात करते हुए नीलकंठन ने बताया कि उनके बच्चे केवल मार्वल की फ़ैंटेसी फ़िल्में देखते थे और भारतीय मिथकों को बहुत ज़्यादा भक्ति-आधारित मानते थे। वे भारतीय मिथकों को केवल धार्मिक दृष्टि से देखने की सोच को बदलना चाहते थे और भारतीय मिथकीय संसार में वैज्ञानिक सोच और तर्क को केंद्र में लाकर कुछ नया रचना चाहते थे।

लेजेंडा: द रियल वीमेन बिहाइंड द मिथ्स सत्र में इतिहासकार जनीना रामिरेज़ ने नारायणी बासु के साथ इतिहास और किंवदंतियों में महिलाओं की आवाज़ों को सामने लाने पर बातचीत की। इस संवाद में लंबे समय से चली आ रही धारणाओं को चुनौती दी गई और भुला दी गई कहानियों को ऐतिहासिक विमर्श के केंद्र में लाने की बात हुई। रामिरेज़ ने बताया कि कैसे सदियों से महिलाओं के जीवन को मिटाया गया, तोड़ा-मरोड़ा गया और मनचाहे रूप में ढाला गया।

आज के समाज और पीढ़ियों के बीच बदलाव पर जेन ज़ी, द मिलेनियल्स एंड मम्मीजी सत्र में चर्चा हुई, जिसमें अनुराग माइनस वर्मा, संतोष देसाई और रिया चोपड़ा, चिराग ठक्कर के साथ संवाद में शामिल हुए। इस सत्र में भारत में बदलते पारिवारिक ढांचे, डिजिटल संस्कृति और सामाजिक मूल्यों में आ रहे बदलावों पर चर्चा की गई। सत्र में प्रेम, उपभोक्तावाद और क्रांति जैसे कई विषयों पर चर्चा हुई। इन सभी विषयों को जोड़ने वाला एक मुख्य विचार पहचान के निर्माण और उसके अभिव्यक्त होने का था, जो इंटरनेट के माध्यम से और उसके प्रभाव के कारण सामने आता है।

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