बेंगलुरु , अगस्त 22 -- कर्नाटक में मॉनसून के दौरान हुई कम बारिश का मसला अब तेज़ी से एक बड़े राजनीतिक और प्रशासनिक संकट में बदल रहा है। विपक्ष सरकार पर सूखा घोषित करने में देरी का आरोप लगा रहा है, जबकि किसान फसल के नुकसान और पानी की कमी से जूझ रहे हैं।
बारिश की कमी से शुरू हुई यह समस्या अब सरकार के लिए तीन तरफा दबाव का मुद्दा बन गई है जिसमें राज्य सरकार के लिए इसे सूखा घोषित करना, किसानों को राहत देना और कर्नाटक के पानी के अधिकार को भी बनाए रखना है । इसके साथ ही, कावेरी विवाद ने राज्य की पानी की सुरक्षा से जुड़ी बढ़ती चिंताओं को और बढ़ा दिया है।
विपक्ष ने कांग्रेस सरकार पर हमले तेज़ कर दिए हैं और पानी संकट वाले क्षेत्रों को सूखा घोषित करने तथा प्रभावित किसानों को मुआवज़ा देने की मांग की है। विपक्ष ने सरकार के उस फ़ैसले पर सवाल उठाए हैं जिसमें सूखा प्रभावित इलाकों को औपचारिक रूप से घोषित किए बिना ही सूखे की स्थिति पर चर्चा की जा रही है।
सरकार ने अपना पक्ष रखते हुए कहा है कि राजस्व और कृषि विभाग फसल के नुकसान का संयुक्त आकलन कर रहे हैं और अंतिम निर्णय ज़मीनी स्तर के आकलन और एनडीआरएफ के नियमों के आधार पर लिया जाएगा।
लेकिन इस समय यह मामला काफी संवेदनशील हो गया है। विधानसभा का मॉनसून सत्र 27 अगस्त को खत्म होने वाला है, जबकि सूखा प्रभावित तालुकों को अंतिम रूप देने के लिए सरकार की प्रस्तावित समय-सीमा सत्र के बाद तक जा रही है। इससे यह आशंका पैदा हो गई है कि विधानसभा और विधान परिषद का सत्र फसल के नुकसान की वास्तविक सीमा और राहत पैकेज पर व्यापक चर्चा के बिना ही समाप्त हो सकता है।
किसानों के लिए राजनीतिक कैलेंडर अब उतना जरूरी नहीं है और उनकी तत्काल चिंताएं बारिश की कमी से पैदा हुई स्थिति से निपटना, फसली नुकसान, पीने के पानी की उपलब्धता और खेती-बाड़ी में बढ़ती मुश्किलों को दूर किया जाया जाना अहम है।
पानी के मुद्दे ने स्थिति को और जटिल बना दिया है। कावेरी विवाद के कारण राजनीतिक गरमा-गर्मी बनी हुई है, और सरकार पर राज्यों के बीच पानी के बंटवारे से जुड़ी अपनी ज़िम्मेदारियों और कर्नाटक के किसानों तथा पीने के पानी की ज़रूरतों की मांग के बीच संतुलन बनाने का दबाव है।
इस प्रकार, असली राजनीतिक लड़ाई अब केवल इस बात पर नहीं है कि कर्नाटक में कम बारिश हुई है या नहीं ,बल्कि इस बात पर है कि सरकार आधिकारिक तौर पर संकट को कब स्वीकार करेगी। किसानों तक कितनी राहत पहुंचेगी और राज्य पानी के तेज़ी से कम होते संसाधनों का प्रबंधन कैसे करेगा।
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