बेंगलुरु , मार्च 22 -- कर्नाटक में दावणगेरे दक्षिण और बागलकोट विधानसभा सीटों पर उपचुनाव में कांटे का मुकाबला देखने को मिल रहा है।

एक ओर जहां सत्ताधारी कांग्रेस अपने अंदरूनी गुटों से जूझ रही है, वहीं दूसरी ओर विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) इन चुनावों को कर्नाटक में शासन-प्रशासन पर एक जनमत संग्रह के तौर पर पेश करने की कोशिश कर रही है।

इन दोनों सीटों पर नौ अप्रैल को मतदान होगा, जबकि मतगणना चार मई को मतगणना निर्धारित है। इन दोनों सीटों पर मुकाबलों को अब चुनावी ताकत के साथ-साथ, सत्ता के विभिन्न केंद्रों और सामाजिक समीकरणों के बीच तालमेल बनाए रखने की कांग्रेस की क्षमता की कसौटी के तौर पर देखा जा रहा है।

इन दिनों सीटों पर चुनाव पूर्व मंत्रियों शमनूर शिवशंकरप्पा और एच.वाई. मेटी के निधन के कारण हो रहा है। ये चुनाव बजट सत्र के दौरान एक राजनीतिक रूप से संवेदनशील मोड़ पर हो रहे हैं, जिससे उम्मीदवारों के चयन और चुनाव प्रचार की रणनीति को लेकर स्थिति और भी ज़्यादा अहम और तात्कालिक हो गयी है।

कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती दावणगेरे दक्षिण में है, जहाँ टिकट बँटवारे ने पार्टी के अंदर की दरारें उजागर कर दी है। खान एवं बागवानी मंत्री एस.एस. मल्लिकार्जुन ने किसी अल्पसंख्यक उम्मीदवार को मैदान में उतारने का विरोध किया, जबकि आवास मंत्री बी.जेड. ज़मीर अहमद खान ने इसका समर्थन किया। यह उस प्रयास को दर्शाता है जिसके तहत बड़ी मुस्लिम आबादी वाले इस निर्वाचन क्षेत्र में मुस्लिम वोटों को एकजुट करने की कोशिश की जा रही है।

आखिरकार कांग्रेस ने श्री मल्लिकार्जुन के पुत्र समर्थ मल्लिकार्जुन को अपना उम्मीदवार बनाया। यह एक ऐसा पारिवारिक चुनाव है जो 'विरासत की राजनीति' पर पार्टी की निर्भरता को दिखाता है, भले ही इससे अन्य दावेदारों के बीच असंतोष पैदा होने का खतरा हो।

बागलकोट में कांग्रेस का टिकट श्री उमेश मेती को मिला है, जो दिवंगत एच.वाई. मेती के परिवार से ही आते हैं। पार्टी नेतृत्व द्वारा एकता दर्शाने के प्रयास तो साफ़ दिखे हैं, लेकिन अंदरूनी खींचतान यह भी बताती है कि पार्टी कितनी हद तक 'समझौते वाली राजनीति' और प्रभावशाली परिवारों पर निर्भर है।

इस बीच, भाजपा ने इस स्थिति का फ़ायदा उठाने में ज़रा भी देर नहीं की और इन उपचुनावों को 'शासन की परीक्षा' के तौर पर पेश किया। पार्टी ने बूथ स्तर तक अपने नेटवर्क को सक्रिय कर दिया है, प्रभारी नियुक्त किए हैं, और एक ऐसा अभियान शुरू किया है जिसमें विकास कार्यों में कथित कमियों, गारंटी योजनाओं से पड़ने वाले वित्तीय बोझ, और आरक्षण नीतियों से जुड़े विवादों को मुख्य रूप से उठाया जा रहा है।

चूंकि जनता दल (सेक्युलर) का इन चुनावों के नतीजों पर कोई खास असर पड़ने की उम्मीद नहीं है, इसलिए ये दोनों ही मुकाबले अब सीधे तौर पर कांग्रेस और भाजपा के बीच की लड़ाई बनते जा रही हैं। इन चुनावों के तात्कालिक दांव-पेच से परे इन उपचुनावों को 2028 के विधानसभा चुनावों से पहले एक प्रतीकात्मक 'सेमी-फ़ाइनल' के तौर पर देखा जा रहा है।

ऐसे में, भले ही इन उम्मीदवारों का कार्यकाल छोटा हो, लेकिन जीत मिलने पर पार्टी को एक ज़बरदस्त गति मिलने की उम्मीद है। कांग्रेस के सामने दोहरी चुनौती है। एक तरफ तो उसे लोगों की सहानुभूति को वोटों में बदलना है, और दूसरी तरफ उसे जातिगत समीकरणों, अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधित्व, और राजनीति में गहरी जड़ें जमा चुके परिवारों से जुड़े अपने अंदरूनी विरोधाभासों को भी संभालना है। वहीं, भाजपा का लक्ष्य है कि वह सत्ताधारी पार्टी को 'बिखरी हुई पार्टी' के तौर पर पेश करे, और खुद को एक 'एकजुट विकल्प' के रूप में स्थापित करे।

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