बेंगलुरु , जुलाई 03 -- कर्नाटक विधानसभा में विपक्ष के नेता आर. अशोक ने शुक्रवार को मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार से मेकेदातु जलाशय परियोजना पर तमिलनाडु कांग्रेस के विरोध पर जवाब मांगा। उन्होंने शुक्रवार को आरोप लगाया कि अपनी ही पार्टी के नेताओं की आपत्तियों के बावजूद वह इस मामले पर "पूरी तरह खामोश" हैं।

भाजपा नेता ने श्री शिवकुमार की चुप्पी पर सवाल उठाते हुए कहा कि मुख्यमंत्री ने बार-बार खुद को मेकेदातु परियोजना का सबसे मजबूत समर्थक बताया है लेकिन कावेरी नदी पर प्रस्तावित जलाशय के निर्माण के खिलाफ तमिलनाडु कांग्रेस नेताओं की चेतावनी के बावजूद कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है।

श्री अशोक ने आरोप लगाया कि कर्नाटक की कांग्रेस सरकार राज्य के हितों की रक्षा करने और अपने राष्ट्रीय नेतृत्व का पालन करने के बीच फंसी हुई लग रही है। उन्होंने पूछा कि श्री शिवकुमार कर्नाटक के परियोजना पर दावे का बचाव करेंगे या चुप रहेंगे क्योंकि विरोध पड़ोसी राज्य के कांग्रेस नेताओं की ओर से हो रहा है।

उन्होंने कहा कि कर्नाटक के लोगों को लंबे समय से अटके उस परियोजना पर राज्य सरकार का रुख जानने का अधिकार है जिसे बेंगलुरु की बढ़ती पीने के पानी की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अहम बताया गया है।

भाजपा नेता ने आगे सवाल उठाया कि अगर तमिलनाडु कांग्रेस मेकेदातु परियोजना का विरोध करती रही तो क्या कांग्रेस आलाकमान कर्नाटक सरकार को इस परियोजना पर आगे बढ़ने की इजाज़त देगा? उन्होंने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री की चुप्पी ने कर्नाटक के हितों की रक्षा करने के सरकार के संकल्प पर संदेह उत्पन्न कर दिया है।

भाजपा द्वारा यह हमला ऐसे समय में किया गया है जब कर्नाटक सरकार मेकेदातु परियोजना को आगे बढ़ाने की कोशिशें तेज़ कर रही है। इस सप्ताह की शुरुआत में, श्री शिवकुमार ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे परियोजना की विस्तृत रिपोर्ट में मौजूद सभी तकनीकी कमियों को दूर करें ताकि कर्नाटक का पक्ष मज़बूत हो सके और तमिलनाडु को उच्चतम न्यायालय में इसे चुनौती देने का कोई आधार न मिले।

उल्लेखनीय है कि प्रस्तावित मेकेदातु जलाशय परियोजना कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच लंबे समय से विवाद का विषय रहा है। जहां कर्नाटक का कहना है कि इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य बेंगलुरु को पीने का पानी उपलब्ध कराना और कावेरी नदी के पानी में तमिलनाडु के तय हिस्से को प्रभावित किए बिना पनबिजली उत्पन्न करना है वहीं तमिलनाडु लगातार इसका विरोध कर रहा है। उसका तर्क है कि इस जलाशय से नदी के अनुप्रवाह में पानी की उपलब्धता पर बुरा असर पड़ सकता है।

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