बेंगलुरु , अप्रैल 27 -- कर्नाटक उच्च न्यायालय ने 'मेट्रो चिक्स' की याचिका खारिज करते हुए कहा, ''सीसीटीवी सुरक्षा के लिए है, प्रदर्शन के लिए नहीं है।
कर्नाटक उच्च न्यायालय ने सोमवार को 'बेंगलौर मेट्रो चिक्स' नाम के इंस्टाग्राम पेज चलाने वाले एक व्यक्ति के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने से इनकार कर दिया।
याचिकाकर्ता बीके दिगंत पर इंस्टाग्राम हैंडल चलाने का आरोप है। आरोप है कि इस हैंडल पर बेंगलुरु मेट्रो में सफर कर रही महिलाओं की तस्वीरें और वीडियो उनकी सहमति के बिना अपलोड किए गए थे। ताक-झांक से जुड़ी धाराओं और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के तहत दर्ज प्राथमिकी के आधार पर उसे मई 2025 में गिरफ्तार किया गया था।
उसका बचाव का तर्क सीधा-सा था और आजकल यह तर्क काफी आम होता जा रहा है। उसने दलील दी कि उसने जो किया, वह सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था में लगे सीसीटीवी कैमरों से किसी भी तरह अलग नहीं था। उसने कहा कि कैमरे तो हर जगह लगे होते हैं, इसलिए रिकॉर्डिंग करना कोई अपराध नहीं हो सकता।
यह तर्क सुनने में तो आधुनिक लगता है लेकिन असल में ऐसा है नहीं। यह एक पुरानी भ्रांति है, जिसे नयी तकनीक का चोला पहना दिया गया है।
अदालत ने एक ही झटके में इस तर्क को ध्वस्त कर दिया। जस्टिस एम. नागप्रसन्ना ने पूछा, "कौन से सीसीटीवी कैमरे? महिलाओं की पीठ की तस्वीरें खींचकर उन्हें 'मेट्रो चिक्स' पर पोस्ट करना क्या अपराध नहीं है?" उन्होंने न केवल बचाव पक्ष के तर्क को खारिज किया बल्कि उसके पीछे छिपे धोखे को भी उजागर कर दिया।
सीसीटीवी वह चीज नहीं है, जैसा कि याचिकाकर्ता ने दावा किया था। यह चयन का उपकरण नहीं है। यह किसी एक व्यक्ति पर ध्यान केंद्रित करने वाला यंत्र नहीं है। इसे इसलिए नहीं बनाया गया है कि भीड़ में से किसी एक व्यक्ति को अलग करके उसे 'कंटेंट' (सामग्री) में बदल दिया जाए। यह एक पूरी व्यवस्था है, जो लगातार चलती रहती है, नियमों से बंधी होती है और जिसमें कोई व्यक्तिगत पक्षपात नहीं होता। यह सब पर नजर रखती है लेकिन किसी एक को निशाना नहीं बनाती। इसकी वैधता ठीक इसी बात में निहित है कि इसमें चयन का कोई विकल्प नहीं होता। यही कारण है कि इसे सुरक्षा के बुनियादी ढांचे के तौर पर स्वीकार किया जाता है। इसका मकसद सुरक्षा देना है, न कि लोगों को नुमाइश के तौर पर दिखाना।
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