चेन्नई , जुलाई 10 -- मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ ने शुक्रवार को तमिलनाडु सरकार के नीतिगत फैसलों में दखल देने से इनकार करते हुए करूर भगदड़ पीड़ितों के परिवारों के 32 सदस्यों को नौकरी की नियुक्ति पत्र जारी करने की अनुमति प्रदान की।

न्यायमूर्ति सी.वी. कार्तिकेयन और न्यायमूत्रि आर. शक्तिवेल की पीठ ने अधिवक्ता थीरन थिरुमुरुगन की याचिका पर यह अंतरिम आदेश दिया। इस याचिका में टीवीके सरकार के उस फ़ैसले को चुनौती दी गयी थी जिसमें सितंबर 2025 में एक जनसंपर्क कार्यक्रम के दौरान हुए दुखद भगदड़ में 41 लोगों की मौत हो गयी थी और मृतकों के परिवारों को सरकारी नौकरी देने का निर्णय लिया गया था।

अदालत का यह आदेश तब आया जब विजय मुख्यमंत्री बनने के बाद पीड़ितों के परिवारों से मिलने एवं मानवीय आधार पर नियुक्ति पत्र सौंपने के लिए करूर की पहली यात्रा पर जा रहे थे।

अदालत ने कहा कि ये नियुक्तियां अस्थायी होंगी और न्यायिक समीक्षा के अधीन होंगी, साथ ही अदालत ने इस मामले में टीएनपीएसी को भी पक्षकार बनाया।

पीठ ने सरकार के नीतिगत फ़ैसले में अदालत के दखल को सही नहीं माना और उसने मृतकों के परिवारों को नियुक्ति पत्र सौंपने के लिए सार्वजनिक कार्यक्रम आयोजित करने की मंज़ूरी प्रदान की। अदालत ने हालांकि यह भी कहा कि ये नियुक्तियां अस्थायी होंगी और न्यायिक समीक्षा के अधीन रहेंगी। साथ ही अदालत ने नियुक्त लोगों को पहली सैलरी मिलने से पहले मामले की अगली सुनवाई 20 जुलाई को निर्धारित की।

अदालत ने तमिलनाडु लोक सेवा आयोग के सदस्य सचिव को भी स्वतः संज्ञान लेकर मामले में शामिल किया और उन्हें निर्देश दिया कि वह दया के आधार पर नौकरी देने के नियमों और इस मामले में उनका पालन करने पर एक रिपोर्ट दाखिल करें।

अपनी याचिका में, अधिवक्ता थीरन ने मुख्य सचिव, अतिरिक्त मुख्य सचिव, सचिव (कार्मिक एवं प्रशासनिक सुधार विभाग), सचिव (गृह विभाग), सचिव (राजस्व एवं आपदा प्रबंधन विभाग) और जिला कलेक्टर (करूर) को निर्देश देने की भी मांग की। उन्होंने कहा कि जब तक उच्चतम न्यायालय में इस मामले का निपटारा नहीं हो जाता तब तक भगदड़ में मारे गए लोगों के परिवारों के लिए कोई सरकारी नियुक्ति आदेश जारी नहीं किया जाये और न ही उसे लागू किया जाये। शीर्ष अदालत के आदेश पर इस घटना की सीबीआई जांच के आदेश दिये गये थे और इसकी निगरानी उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति अजय रस्तोगी की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय समिति कर रही है।

उन्होंने आगे कहा कि अगर मामले में फैसला आने से पहले नियुक्ति के आदेश जारी किये जाते हैं तो स्पष्ट नीति न होने और उच्चतम न्यायालय में करूर त्रासदी से जुड़ी कार्यवाही लंबित होने के कारण इसके अपरिवर्तनीय कानूनी एवं प्रशासनिक परिणाम हो सकते हैं।

सुनवाई के दौरान सरकारी वकील ने एक पुराने मामले का उल्लेख किया जिसमें थूथुकुडी पुलिस की गोलीबारी में मारे गए लोगों के परिवारों को सरकारी नौकरी दी गयी थी।

अपने जवाब में अदालत ने कहा कि दोनों घटनाओं को एक जैसा नहीं माना जा सकता क्योंकि थूथुकुडी की घटना में राज्य की ओर से पुलिस की ज्यादती का मामला माना गया था जबकि करूर की घटना को राज्य की ओर से पुलिस की ज्यादती का मामला नहीं माना जा सकता।

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