रांची , सितंबर 26 -- झारखंड के कोडरमा जिले की पहचान कभी उसकी धरती से निकलने वाले चमकीले अभ्रक यानी माइका से हुआ करती थी।

यहां की खदानों से निकलने वाला माइका देश ही नहीं, दुनिया के कई देशों तक पहुंचता था। खनन से लेकर माइका चुनने, छंटाई, प्रसंस्करण और कारोबार तक हजारों लोगों की रोजी-रोटी इससे जुड़ी थी। लेकिन समय के साथ नीतियां बदलीं और वन संरक्षण से जुड़ी पाबंदियों के बीच वैध माइका खदानें धीरे-धीरे बंद होती चली गईं। इसके साथ ही कभी रोजगार का बड़ा केंद्र रहा यह इलाका बेरोजगारी, पलायन और आर्थिक बदहाली की समस्या से जूझने लगा।

कोडरमा में माइका कारोबार सिर्फ खदानों तक सीमित नहीं था। 1960 के दशक में बड़ी आबादी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से इस उद्योग से जुड़ी थी। खदानों से निकले माइका की छंटाई और प्रसंस्करण के बाद इसे देश-विदेश के बाजारों में भेजा जाता था। इस कारोबार ने स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत आधार दिया था और बड़ी संख्या में परिवारों को रोजगार उपलब्ध कराया था।

खदानों के बंद होने का सबसे ज्यादा असर उन परिवारों पर पड़ा, जिनकी आजीविका सीधे माइका पर निर्भर थी। स्थायी रोजगार का विकल्प नहीं मिलने के कारण बड़ी संख्या में मजदूर दूसरे शहरों और राज्यों की ओर पलायन करने लगे। आज भी कुछ इलाकों में लोग जंगल और खदान क्षेत्रों के आसपास बचे माइका के टुकड़े चुनकर किसी तरह अपनी आजीविका चलाते नजर आते हैं। यह काम बेहद कम आमदनी वाला होने के साथ सुरक्षा के लिहाज से भी जोखिम भरा है।

वैध कारोबार के कमजोर पड़ने के साथ अवैध उत्खनन और माइका संग्रह की समस्या भी सामने आई। इससे एक ओर जंगल और जमीन पर दबाव बढ़ा, वहीं दूसरी ओर मजदूरों की सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े हुए। पर्याप्त सुरक्षा इंतजाम के बिना खनन क्षेत्र में काम करने वाले मजदूर दुर्घटनाओं और स्वास्थ्य संबंधी जोखिमों का सामना करते हैं।

माइका कारोबार से जुड़े कई कारोबारी भी अब कोडरमा से अपना व्यवसाय समेट रहे हैं। कारोबार का केंद्र दूसरे राज्यों की ओर खिसकने से स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर और सीमित हो रहे हैं। इसका सीधा असर उन मजदूरों पर पड़ रहा है, जिनकी आमदनी माइका की खरीद-बिक्री और प्रसंस्करण से जुड़ी रही है।

कभी कोडरमा का माइका विदेशी बाजारों में अपनी पहचान रखता था। स्थानीय स्तर पर इसकी छंटाई और प्रसंस्करण के बाद इसे विदेशों तक भेजा जाता था। इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को गति मिलने के साथ निर्यात के जरिए देश को विदेशी मुद्रा भी प्राप्त होती थी। उद्योग के कमजोर होने के साथ यह पूरा आर्थिक चक्र लगभग टूट गया।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्षेत्र में माइका संसाधन मौजूद होने के बावजूद स्थानीय लोगों को इससे सुरक्षित और वैध रोजगार क्यों नहीं मिल पा रहा है। पर्यावरण संरक्षण जरूरी है, लेकिन इसके साथ स्थानीय रोजगार और मजदूरों की आजीविका का स्थायी समाधान तलाशना भी जरूरी है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि माइका कारोबार के कमजोर पड़ने के बाद परिवार चलाना मुश्किल हो गया है। कई परिवारों की आमदनी इतनी कम है कि रोजमर्रा का खर्च निकालना भी चुनौती बन गया है। रोजगार के सीमित अवसरों के कारण युवाओं को काम की तलाश में दूसरे राज्यों का रुख करना पड़ रहा है।

माइका कारोबार ने बातचीत में बताया कि कोडरमा में माइका खनन का इतिहास काफी समृद्ध रहा है। 1970 और 1980 के दशक में यहां सैकड़ों खदानें संचालित होती थीं। जिसमें दिबौर घाटी और नीरू पहाड़ी के इलाके प्रमुख थे। इस दौरान लगभग 10,000 से अधिक मजदूर माइका खनन में लगे रहते थे। कोडरमा का माइका अपनी उत्कृष्ट गुणवत्ता के कारण वैश्विक बाजार में विशेष मांग रखता था। इसका सबसे बड़ा खरीदार रूस हुआ करता था जो इसे बुलेटप्रूफ सामग्री बनाने के लिए इस्तेमाल करता था।

कोडरमा के लिए माइका सिर्फ एक खनिज नहीं, बल्कि दशकों पुरानी आर्थिक पहचान है। जरूरत ऐसी व्यवस्था बनाने की है, जिसमें पर्यावरण संरक्षण, वैध खनन, मजदूरों की सुरक्षा और स्थानीय रोजगार के बीच संतुलन कायम हो। यदि सुरक्षित और कानूनी माइका कारोबार के लिए प्रभावी नीति तैयार होती है, तो क्षेत्र की ठप पड़ी आर्थिक गतिविधियों में फिर से जान आ सकती है।

कभी जिस माइका की चमक से कोडरमा की पहचान देश-दुनिया में बनी थी, आज उसी चमक को वापस लाने की चुनौती है। इस बार जरूरत सिर्फ कारोबार को पुनर्जीवित करने की नहीं, बल्कि विकास के साथ मजदूरों की सुरक्षा और स्थानीय लोगों के स्थायी रोजगार को सुनिश्चित करने की भी है।

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