कपूरथला , अगस्त 18 -- पंजाब में कपूरथला की अतिरिक्त सत्र अदालत ने वर्ष 2023 के ढिल्लों बंधुओं की आत्महत्या मामले में तीन पुलिस अधिकारियों को बरी कर दिया है।

अदालत ने कहा कि अभियोजन के आरोपों को यदि पूरी तरह सही भी मान लिया जाये, तब भी आत्महत्या के लिए उकसाने यानी आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण का अपराध प्रथम दृष्टया साबित नहीं होता।

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश गुरमीत तिवाना ने मंगलवार को यह आदेश तलवंडी चौधरियां थाने में तीन सितंबर 2023 को दर्ज एफआईआर संख्या 52 के संबंध में दिया। मामले में तत्कालीन पुलिस अधिकारियों नवदीप सिंह और बलविंदर कुमार तथा महिला कांस्टेबल जगजीत कौर आरोपी थे। उनके खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धाराओं 306, 506 और 34 के तहत मामला दर्ज किया गया था। आरोपियों ने बीएनएसएस की धारा 250 के तहत डिस्चार्ज याचिकाएं दायर की थीं। अभियोजन पक्ष के अनुसार, 16 अगस्त 2023 को मनवजीत सिंह ढिल्लों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई हुई थी। इसके बाद उनके भाई जशनबीर सिंह ढिल्लों कथित तौर पर मानसिक रूप से परेशान हो गये और 17 अगस्त को ब्यास नदी में छलांग लगा दी। आरोप था कि भाई के खिलाफ हुई पुलिस कार्रवाई से व्यथित होकर उन्होंने यह कदम उठाया। बाद में ब्यास नदी से एक शव बरामद हुआ, जिसकी पहचान कपड़ों, जूतों, बेल्ट और अन्य सामान के आधार पर जशनबीर सिंह के रूप में की गयी। जांच के दौरान डीएनए नमूने भी लिये गये, लेकिन नमूनों की खराब स्थिति के कारण डीएनए रिपोर्ट निर्णायक नहीं रही। एफएसएल रिपोर्ट में मौत का कारण डूबने से दम घुटना (अस्फिक्सिया) बताया गया।

आरोपियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव पुरी ने अदालत में दलील दी कि पुलिस अधिकारियों द्वारा जशनबीर सिंह को आत्महत्या के लिए उकसाने का कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सबूत नहीं है। बचाव पक्ष ने कहा कि जशनबीर सिंह का आरोपी पुलिस अधिकारियों से कोई सीधा संपर्क नहीं था और उनके भाई मनवजीत सिंह के खिलाफ धारा 107/151 सीआरपीसी के तहत की गयी कार्रवाई कानूनी पुलिस प्रक्रिया का हिस्सा थी।

बचाव पक्ष ने डीएनए रिपोर्ट, कॉल डिटेल रिकॉर्ड और जांच में सामने आये अन्य तथ्यों का भी हवाला दिया। अभियोजन पक्ष ने डिस्चार्ज याचिकाओं का विरोध करते हुए कहा कि आरोप तय करने के लिए पर्याप्त प्रथम दृष्टया सामग्री रिकॉर्ड पर मौजूद है और इस चरण पर अदालत को साक्ष्यों की अंतिम विश्वसनीयता का विस्तृत मूल्यांकन नहीं करना चाहिए।

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि केवल इस आधार पर कि किसी व्यक्ति ने किसी घटना के बाद आत्महत्या कर ली, यह स्वतः निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि उस घटना में शामिल लोगों ने आत्महत्या के लिए उकसाया था। आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण का अपराध साबित करने के लिए आरोपी की आवश्यक मंशा तथा ऐसा सकारात्मक कृत्य या भूमिका सामने आना जरूरी है, जिससे मृतक को आत्महत्या के लिए उकसाया या प्रोत्साहित किया गया हो।

अदालत ने विशेष रूप से कहा कि जशनबीर सिंह का आरोपी पुलिस अधिकारियों के साथ कोई सीधा संपर्क नहीं था। वह पुलिस थाने पहुंचा था और अपने भाई के खिलाफ हुई कार्रवाई को देखकर कथित तौर पर परेशान हुआ था, लेकिन अभियोजन की सामग्री से किसी आरोपी के किसी विशिष्ट कृत्य और जशनबीर सिंह की आत्महत्या के बीच सीधा संबंध स्थापित नहीं होता।

अदालत ने यह भी कहा कि यदि मनवजीत सिंह के खिलाफ पुलिस कार्रवाई को अनुचित भी माना जाये, तो वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों से शिकायत अथवा अन्य कानूनी उपाय उपलब्ध थे। केवल किसी रिश्तेदार के खिलाफ हुई कार्रवाई से व्यक्ति के मानसिक रूप से परेशान होने और बाद में आत्महत्या करने के आधार पर पुलिस अधिकारियों पर आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण की आपराधिक जिम्मेदारी नहीं डाली जा सकती।

अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि रिकॉर्ड पर मौजूद आरोपों को पूरी तरह सही मान लेने पर भी आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण के अपराध के आवश्यक तत्व स्थापित नहीं होते। इसके चलते अदालत ने नवदीप सिंह, बलविंदर कुमार और जगजीत कौर की डिस्चार्ज याचिकाएं मंजूर कर उन्हें मामले से डिस्चार्ज कर दिया।

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